शिक्षा के बारे में बाइबल क्या कहती है?



प्रश्न: शिक्षा के बारे में बाइबल क्या कहती है?

उत्तर:
नीतिवचन की पुस्तक सुलैमान के द्वारा उसके पुत्रों को दिए निर्देशों से भरी हुई है। पुत्र को इस अनुदेश से शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, और शिक्षा से प्राप्त ज्ञान को जीवन में लागू करने के परिणाम को ज्ञान कहा जाता है। पवित्रशास्त्र में शिक्षा की प्रक्रिया के बारे में बहुत कुछ लिखा हुआ मिलता है, और यह अभिभावकों और उनके बच्चों के साथ आरम्भ होता है। अभिभावकों को दिए हुए आदेश में उन्हें अपने बच्चों का पालन पोषण प्रभु में करना है (इफिसियों 6: 4), और यूनानी शब्द पेडिया ("पोषण") अपने साथ प्रशिक्षण, शिक्षा, निर्देश और अनुशासन का विचार रखता है। जब बच्चे परमेश्‍वर के बारे में शिक्षा प्राप्त करते हैं, उन्हें बुद्धिमानी से अपने अभिभावकों का सम्मान करने का अवसर दिया जाता है, और उस सम्मान का आधार शिक्षा की निरन्तर प्रक्रिया और प्राप्त की हुई शिक्षा होती है, जो उसे जीवन में लागू करने से आती है। सुलैमान हमें बताता है कि सभी सच्चे ज्ञान का आधार परमेश्‍वर का भय है (नीतिवचन 1:7)। शब्द "भय" में यहाँ आतंक या दहशत के विचार नहीं पाए जाते हैं, अपितु इसके स्थान पर यह परमेश्‍वर की पवित्रता और महिमा के लिए भय और श्रद्धा का है और उसे निराश करने या उसकी अवज्ञा करने की अनिच्छा से नहीं है। यीशु ने कहा कि जब हम सत्य को जानते हैं, तो सत्य हमें स्वतन्त्र कर देता है (यूहन्ना 8:32)। भय से स्वतन्त्रता सत्य में शिक्षित होने से आती है।

रोमियों की पुस्तक में प्रेरित पौलुस ग्यारह बार "जानने" या "जानकारी" शब्द का उपयोग करता है। हमें क्या जानना हैं? हमें स्वयं को परमेश्‍वर के वचन से शिक्षित करना है, क्योंकि जब हम आत्मिक ज्ञान को प्राप्त करते हैं, तब हम उस ज्ञान को व्यावहारिक तरीके से अपने जीवन में लागू कर सकते हैं, स्वयं को परमेश्‍वर के अधीन कर देने और ईश्‍वरीय ज्ञान का प्रयोग करके आत्मा और सच्चाई के साथ प्रभु की सेवा कर सकते हैं (रोमियों 6:11 -13)। एक पुरानी कहावत है कि, "हम जो नहीं जानते उसका उपयोग नहीं कर सकते।" जब बात बाइबल की शिक्षा के बारे में आती है, तब यह सिद्धान्त दोगुना सत्य हो जाता है। हमें बाइबल के अर्थों से स्वयं को शिक्षित करना है? हम परमेश्‍वर के वचन को पढ़ते, अध्ययन, स्मरण करते हैं और इसके ऊपर ध्यान चिन्तन करते हैं!

प्रेरित पौलुस तीमुथियुस को उपदेश देता है कि "अपने आप को परमेश्‍वर का ग्रहणयोग्य और ऐसा काम करनेवाला ठहराने का प्रयत्न कर...जो सत्य के वचन को ठीक रीति से काम में लाता है" (2 तीमुथियुस 2:15)। "अध्ययन" का अनुवाद करने के लिए यूनानी शब्द का अर्थ है, परिश्रम करना, स्वयं के ऊपर लागू करना या स्वयं के ऊपर लागू करने के लिए शीघ्रता से है। इसलिए, स्वयं को सीखने या शिक्षित करने के लिए, हमें कहा गया है कि हम परमेश्‍वर के वचन का अध्ययन परिश्रम के साथ करें। इसका कारण पौलुस के द्वारा तीमुथियुस को लिखी हुई दूसरी पत्री में पाया जाता है। "सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्‍वर की प्रेरणा से रचा गया है और उपदेश, और समझाने, और सुधारने, और धार्मिकता की शिक्षा के लिये लाभदायक है। ताकि परमेश्‍वर का जन सिद्ध बने, और हर एक भले काम के लिये तत्पर हो जाए" (2 तीमुथियुस 3:16-17)। विचार यहाँ पर यह है कि परमेश्‍वर का वचन हमें सिद्ध या परिपक्व करता है और हमें शिक्षित, विश्‍वासयोग्य सेवकों की तरह सुसज्जित करता है।

बाइबल आधारित शिक्षा नया-जन्म पाए हुए विश्‍वासियों को प्रशिक्षित करती है, ताकि परमेश्‍वर उनमें उस कार्य को पूरा कर सके, जिसके लिए उसने उन्हें ठहराया है (इफिसियों 2:10)। बाइबल आधारित शिक्षा हमें हमारे मनों के नए किए जाने के द्वारा (रोमियों 12:2), मसीह के मन के ज्ञान को लागू करने की चलती रहने वाली प्रक्रिया के साथ परिवर्तित कर देती है, "जो परमेश्‍वर की ओर से हमारे लिए ज्ञान ठहरा — अर्थात्, धर्म और पवित्रता और छुटकारा" (1 कुरिन्थियों 1:30)।

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