प्रायश्चित सम्बन्धी भिन्न सिद्धान्त कौन से हैं?



प्रश्न: प्रायश्चित सम्बन्धी भिन्न सिद्धान्त कौन से हैं? प्रार्थना करने की क्या आवश्यकता है जब परमेश्वर भविष्य को जानता है और सब कुछ उसके नियन्त्रण में है। यदि हम परमेश्वर के मन को परिवर्तित नहीं कर सकते हैं, तो हमें प्रार्थना क्यों करनी चाहिए?

उत्तर:
अभी तक के कलीसियाई इतिहास में, प्रायश्चित के सम्बन्ध में कई विभिन्न दृष्टिकोण पाए जाते हैं, जिनमें से कुछ सच्चे और कुछ झूठे हैं, जिन्हें विभिन्न व्यक्तियों या सम्प्रदायों ने संकलित किया है। विभिन्न दृष्टिकोणों होने के कई कारणों में से एक यह है कि पुराना और नया नियम दोनों ही मसीह के प्रायश्चित के बारे में कई सच्चाइयों को प्रगट करते हैं, जो किसी एक "सिद्धान्त" को पाने के लिए यदि कठिनता नहीं, तो इसे असम्भव सा बना देते हैं, जो पूरी तरह से प्रायश्चित की गहनता को समझा या व्याख्या कर सके। जब हम पवित्रशास्त्र का अध्ययन करते हैं तो हम पाते हैं कि प्रायश्चित सम्बन्धित एक समृद्ध और बहुमुखी चित्र है जिसे बाइबल आपस में सम्बन्धित सत्यों के साथ मसीह के द्वारा पूरे किए जाने वाले छुटकारे के सम्बन्ध में प्रस्तुत करती है। प्रायश्चित सम्बन्धी कई भिन्न सिद्धान्तों के लिए एक अन्य महत्वपूर्ण कारक जिससे हम प्रायश्चित के बारे में बहुत कुछ सीख सकते हैं, प्रायश्चित को पुराने नियम के बलिदान पद्धति के अधीन परमेश्‍वर के लोगों के दृष्टिकोण और अनुभव से समझने की आवश्यकता है। मसीह का प्रायश्चित, इसका उद्देश्य और जो कुछ इसने पूरा किया है, को लेकर एक ऐसा गहन विषय है जिसके ऊपर हजारों की सँख्या में पुस्तकें लिखी जा सकती हैं। यह लेख इस विषय से सम्बन्धित कई सिद्धान्तों का संक्षिप्त अवलोकन प्रदान करता है जिसे किसी न किसी समय पर आगे बढ़ाया गया है। प्रायश्चित के ऊपर विभिन्न दृष्टिकोणों को देखने से पहले, हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि कोई भी दृष्टिकोण जो मनुष्य के पापी होने की दशा या प्रायश्चित के वैकल्पिक स्वभाव की पहचान नहीं करता वह अपनी त्रुटिपूर्ण और भ्रान्त शिक्षा वाला है।

शैतान को फिरौती देने वाला सिद्धान्त : यह दृष्टिकोण मसीह के प्रायश्चित को शैतान को अदा की गई फिरौती के रूप में देखता है जिसमें मनुष्य के छुटकारे और स्वतंत्रता को शैतान के बन्धन से खरीदा गया है। यह इस मान्यता पर आधारित है कि मनुष्य की आत्मिक अवस्था शैतान के बन्धन में थी और यह कि मसीह की मृत्यु का अर्थ शैतान के ऊपर परमेश्‍वर की विजय को सुनिश्चित करना था। इस सिद्धान्त का पवित्रशास्त्रीय समर्थन बहुत कम ही मिलता है और अभी तक के इतिहास में इसके कुछ ही समर्थक पाए जाते हैं। यह सिद्धान्त बाइबल आधारित नहीं है, क्योंकि यह परमेश्‍वर की अपेक्षा, शैतान की ओर, ऐसे देखता है कि जिसने यह मांग की कि पाप के लिए मूल्य अदा किया जाना चाहिए। इस प्रकार, यह पूर्ण रीति से परमेश्‍वर के न्याय की मांग को अनदेखा कर देता है जैसा कि पूरे पवित्रशास्त्र में देखा जा सकता है। इसमें साथ ही शैतान के प्रति उच्च दृष्टिकोण पाए जाते हैं जिसमें यह उसे ऐसे देखता या देखना चाहिए कि जो कुछ वह करता है उससे कहीं ज्यादा वह सामर्थी है। इस विचार का कोई भी पवित्रशास्त्रीय समर्थन नहीं मिलता है कि पापियों के ऊपर शैतान का कुछ ऋण है, अपितु पूरे पवित्रशास्त्र में हम देखते हैं कि परमेश्‍वर ही है जिसे पाप की कीमत को अदा करने की आवश्यकता है।

आवृत्ति वाला सिद्धान्त : यह सिद्धान्त कहता है कि मसीह के प्रायश्चित्त ने मानव जाति की गति को अवज्ञा से आज्ञाकारिता में पलट दिया है। यह विश्‍वास करता है कि मसीह का जीवन, मानव जीवन के सभी अवस्थाओं की पुनरावृत्ति करता है और ऐसा करने के द्वारा आदम के द्वारा आरम्भ की हुई अवज्ञा की गति को पलट देता है। इस सिद्धान्त को पवित्रशास्त्र से समर्थित नहीं किया जा सकता है।

नाटकीयता वाला सिद्धान्त : यह दृष्टिकोंण मसीह के प्रायश्चित को भले और बुरे और शैतान को बन्धन से मुक्त हुए मनुष्य की जय के अलौकिक संघर्ष में जय को प्राप्त करने के रूप में देखता है। मसीह की मृत्यु का अर्थ शैतान के ऊपर परमेश्‍वर की जय को सुनिश्चित करने और बुराई के बन्धन से संसार को छुटकारा देने के लिए एक मार्ग का प्रबन्ध किये जाने के लिए था।

रहस्यवाद वाला सिद्धान्त : रहस्यवाद वाला सिद्धान्त यह देखता है कि मसीह का प्रायश्चित पवित्र आत्मा की सामर्थ्य के द्वारा हमारी अपनी स्वयं के पापों से भरे हुए स्वभाव के ऊपर जय की प्राप्ति है। वे जो इस दृष्टिकोण का अनुसरण करते हैं यह विश्‍वास करते हैं कि इस बात की जानकारी रहस्यमयी तरीके से मनुष्य को प्रभावित करती है और उसके "ईश्‍वर-कृत-अन्त:करण" को सचेत कर देती है। वे साथ ही यह भी विश्‍वास करते हैं कि मनुष्य की आत्मिक अवस्था पाप का परिणाम नहीं है, अपितु यह मात्र "ईश्‍वर-कृत-अन्त:करण" की कमी का होना है। स्पष्ट, है कि यह पवित्रशास्त्र आधारित नहीं है। इसमें विश्‍वास करने का अर्थ है, कि एक व्यक्ति को यह विश्‍वास करना कि मसीह के पास भी पापी स्वभाव था, जबकि पवित्रशास्त्र स्पष्ट है कि यीशु अपने स्वभाव के प्रत्येक पहलू में एक सिद्ध ईश्‍वरीय-मनुष्य था (इब्रानियों 4:15)।

नैतिक प्रभाव वाला सिद्धान्त : इस दृष्टिकोण की मान्यता यह है कि मसीह का प्रायश्चित परमेश्‍वर के प्रेम का प्रदर्शन था जो मनुष्य के मन में नम्रता और पश्चाताप ले आता है। इस दृष्टिकोण का अनसुरण करने वाले यह विश्‍वास करते हैं कि मनुष्य आत्मिक रीति से बीमार है और उसे सहायता की आवश्यकता है और यह कि मनुष्य के लिए परमेश्‍वर के प्रेम को देखने के द्वारा मनुष्य परमेश्‍वर की क्षमा को स्वीकार करने के लिए प्रेरित हो जाता है। वे विश्‍वास करते हैं कि मसीह की मृत्यु का उद्देश्य और अर्थ मनुष्य के प्रति परमेश्‍वर के प्रेम का प्रदर्शन है। जबकि यह सत्य है कि मसीह का प्रायश्चित परमेश्‍वर के प्रेम का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है, तौभी यह दृष्टिकोण बाइबल आधारित नहीं है क्योंकि यह मनुष्य की सच्ची आत्मिक अवस्था का इन्कार कर देता है — जो पाप और अपराध में मरी हुई है (इफिसियों 2:1) — और इन्कार करता है कि परमेश्‍वर को वास्तव में पाप की कीमत को अदा करना है। मसीह के प्रायश्चित का यह दृष्टिकोण एक सच्चे बलिदान या पाप के मूल्य को चुकाए जाने के बिना ही छोड़ देता है।

आदर्श वाला सिद्धान्त : यह दृष्टिकोण मसीह के प्रायश्चित को एक ऐसे आदर्श को प्रदान करने के रूप में देखता जो मनुष्य को परमेश्‍वर के प्रति आज्ञाकारी होने के लिए प्रेरणा स्वरूप विश्‍वास और आज्ञाकारिता का है। इस दृष्टिकोण का अनुसरण करने वाले यह विश्‍वास करते हैं कि मनुष्य आत्मिक रीति से जीवित है और मसीह का जीवन और प्रायश्चित सच्चे विश्‍वास और आज्ञाकारिता का एक नमूना मात्र है और इसे मनुष्यों को इसी तरह के विश्‍वास और आज्ञाकारिता से भरे हुए जीवन को प्रेरणा देने के लिए कार्य करना चाहिए। यह और नैतिक प्रभाव वाला सिद्धान्त एक तरह से एक दूसरे के समान है, जिसमें ये दोनों ही इस तथ्य का इन्कार करते हैं, कि परमेश्‍वर के न्याय को वास्तव में पाप के लिए मूल्य को चुकाए जाने की आवश्यकता है, और क्रूस के ऊपर मसीह की मृत्यु ही इसकी अदायगी थी। नैतिक प्रभाव वाले सिद्धान्त और आदर्श वाले सिद्धान्त के मध्य में मुख्य अन्तर यह है, कि नैतिक प्रभाव वाला सिद्धान्त यह कहता है कि मसीह की मृत्यु हमें यह शिक्षा देती है, कि परमेश्‍वर हमें कितना अधिक प्रेम करता है, और यह की आदर्श वाला सिद्धान्त यह कहता है, कि मसीह की मृत्यु हमें यह शिक्षा देती है, कि कैसे जीवन यापन करना है। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि मसीह हमारे लिए एक ऐसा आदर्श ठहरा है, यहाँ तक कि उसकी मृत्यु में भी, कि जिसका हमें अनुसरण किया जाना चाहिए, परन्तु आदर्श वाला सिद्धान्त मनुष्य की सच्ची आत्मिक अवस्था और यह कि परमेश्‍वर का न्याय पाप के लिए मूल्य चुकाए जाने जिसे मनुष्य चुकाने के लिए सक्षम नहीं है, के तथ्य को पहचानने से असफल हो जाता है।

व्यवसाय करने वाला सिद्धान्त : व्यवसाय करने वाला सिद्धान्त मसीह के प्रायश्चित को परमेश्‍वर के प्रति असीमित सम्मान लाने के रूप में देखता है। जिसके परिणामस्वरूप परमेश्‍वर ने मसीह को ऐसा प्रतिफल दिया, जिसकी उसे आवश्यकता नहीं थी, और मसीह ने इस प्रतिफल को मनुष्य तक पहुँचा दिया। इस दृष्टिकोण का अनुसरण करने वाले यह मानते हैं कि मनुष्य की आत्मिक दशा परमेश्‍वर का अपमान करने वाली थी, और इस कारण मसीह की मृत्यु, जो परमेश्‍वर को असीमित सम्मान ले आई, को उद्धार के लिए पापियों के ऊपर लागू किया जा सकता है। यह सिद्धान्त, अन्य सिद्धान्तों की तरह ही, पापियों की मरी हुई सच्ची आत्मिक अवस्था और उनके लिए मसीह में ही उपलब्ध, पूर्ण रीति से नई सृष्टि की आवश्यकता का इन्कार कर देता है (2 कुरिन्थियों 5:17)।

शासन पद्धति वाला सिद्धान्त : यह दृष्टिकोण मसीह के प्रायश्चित को ऐसा देखता है कि यह पाप के प्रति परमेश्‍वर की अपनी व्यवस्था और अपने व्यवहार के प्रति उच्च सम्मान का प्रदर्शन था। मसीह की मृत्यु के द्वारा ही परमेश्‍वर के पास उन लोगों के पाप को क्षमा करने का कारण मिलता है, जो पश्चाताप करते और मसीह की वैकल्पिक मृत्यु को ग्रहण करते हैं। इस दृष्टिकोण में विश्‍वास करने वाले यह मानते हैं कि मनुष्य की आत्मिक दशा का कारण यह है, कि उसने परमेश्‍वर की नैतिक व्यवस्था को तोड़ा है, और यह की मसीह की मृत्यु का अर्थ पाप के जुर्माने को अदा करने के लिए एक विकल्प था। क्योंकि मसीह ने पाप के लिए जुर्माने को अदा कर दिया है, इसलिए जो मसीह को अपने लिए एक विकल्प मानते हुए ग्रहण करते हैं, उनके लिए परमेश्‍वर को क्षमा प्रदान करना वैधानिक रूप से सम्भव हो गया है। यह दृष्टिकोण इसलिए असफल हो जाता है, क्योंकि यह इस तथ्य की शिक्षा नहीं देता है, कि मसीह ने वास्तव में लोगों के वास्तविक पापों के लिए जुर्माने को चुका दिया है, अपितु इसकी अपेक्षा उसके दु:ख मनुष्य जाति को केवल यह दिखाते हैं, कि परमेश्‍वर की व्यवस्था तोड़ी गई थी, और कुछ जुर्माना चुकाया गया है।

वैधानिक विकल्प वाला सिद्धान्त : यह सिद्धान्त मसीह के प्रायश्चित को प्रतिनिधिक, वैकल्पिक बलिदान के रूप में देखता है जिसने परमेश्‍वर के न्याय की शर्तों को सन्तुष्ट कर दिया है। अपने बलिदान के द्वारा, मसीह मनुष्य के पापों के जुर्माने को चुकाते हुए, मनुष्य के प्रति परमेश्‍वर की क्षमा, अध्यारोपण धार्मिकता और मेल-मिलाप को ले आया। इस दृष्टिकोण में विश्‍वास करने वाले यह मानते हैं कि मनुष्य का प्रत्येक पहलू — जैसे उसका मन, इच्छा और भावनाएँ — पाप के द्वारा भ्रष्ट हो गई थीं और यह कि मनुष्य पूर्ण नैतिक और आत्मिक रीति से भ्रष्ट हो गया था। इस दृष्टिकोण के अनुसार मसीह की मृत्यु ने पाप के जुर्माने को चुका दिया और विश्‍वास के द्वारा मनुष्य पाप के लिए मसीह के द्वारा जुर्माने को चुका दिए जाने के विकल्प को ग्रहण कर सकता है। प्रायश्चित के इस दृष्टिकोण में पाप के प्रति दृष्टिकोण, मनुष्य के स्वभाव, और क्रूस के ऊपर मसीह की मृत्यु के परिणाम पवित्रशास्त्र के बहुत अधिक अनुरूप पाए जाते हैं।



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