क्या परमेश्‍वर के अस्तित्व के प्रति कोई तर्क है?


प्रश्न: क्या परमेश्‍वर के अस्तित्व के प्रति कोई तर्क है?

उत्तर:
परमेश्‍वर के अस्तित्व के प्रति एक निर्णायक तर्क है या नहीं का प्रश्‍न पूरे इतिहास में, अत्यधिक बुद्धिमान लोगों की ओर से इसके दोनों पक्षों के लिए विवाद का विषय रहा है। वर्तमान समयों में, परमेश्‍वर के अस्तित्व की सम्भावना के विरूद्ध तर्कों ने उग्र भावना को धारण कर लिया है, जो बड़े साहस के साथ प्रत्येक उस व्यक्ति को भ्रमित और अतार्किक होने का दोष लगाता है, जो परमेश्‍वर में विश्‍वास करता है। कार्ल मार्क्स बड़ी दृढ़ता से कहते हैं, कि प्रत्येक व्यक्ति जो परमेश्‍वर पर विश्‍वास करता है, अवश्य ही मानसिक विकार से पीड़ित होगा जो उसमें इस अवैद्य सोच का कारण है। मनोचिकित्सक सिग्मण्ड फ्रायड ने लिखा है, कि एक व्यक्ति जो एक सृष्टिकर्ता परमेश्‍वर पर विश्‍वास करता था, वह भ्रमित है और वह केवल एक "इच्छा-पूर्ति" कारक के कारण इन मान्यताओं को मानता है, जिसने उन बातों को उत्पादित किया जिन्हें फ्रायड एक वैध न ठहराई जाने वाली स्थिति मानता है। दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे ने स्पष्टता से कहा, कि विश्‍वास इस बात के तुल्य है, कि सत्य क्या है, उसे न जाना जाए। इतिहास से इन तीनों लोगों (अन्यों के साथ) की पुकार अब उन नास्तिकों की एक नई पीढ़ी द्वारा रटी हुई है, जो यह दावा करते हैं कि परमेश्‍वर में विश्‍वास करना बौद्धिक रूप से अनुचित है।

यह ऐसा वास्तव में है? क्या ईश्‍वर में विश्‍वास होना तार्किक रूप से अस्वीकार्य दृष्टिकोण है? क्या ईश्‍वर के अस्तित्व के लिए एक तर्कसंगत और उचित तर्क पाया जाता है? बाइबल के संदर्भों से बाहर, क्या ईश्‍वर के अस्तित्व को प्रमाणित किया जा सकता है, जो पुराने और नए दोनों तरह के नास्तिकों के दृष्टिकोणों का खण्डन कर सके और एक सृष्टिकर्ता में विश्‍वास करने के लिए पर्याप्त प्रमाणिकता को दे सके? इसका उत्तर हाँ में है, यह हो सकता है। इसके अतिरिक्त, ईश्‍वर के अस्तित्व के लिए एक तर्क की वैधता के प्रदर्शन में, नास्तिकता का विषय बौद्धिक रूप से कमजोर होता दिखाई पड़ता है।

ईश्‍वर के अस्तित्व के लिए तर्क देने के लिए, हमें सही प्रश्‍न पूछकर ही आरम्भ करना चाहिए। हम सबसे मौलिक तात्विक प्रश्‍न के साथ आरम्भ करते हैं: "हमारे पास कुछ भी न होने की अपेक्षा क्यों कुछ है?" यह अस्तित्व का मूल प्रश्‍न है — हम यहाँ क्यों हैं; पृथ्वी यहाँ क्यों है; क्यों ब्रह्माणड यहाँ कुछ भी न होने की अपेक्षा है? इस बिंदु पर टिप्पणी करते हुए, एक धर्मशास्त्री ने ऐसे कहा है, "एक भावार्थ में मनुष्य ईश्‍वर के बारे में किसी भी तरह का कोई प्रश्‍न नहीं पूछता, उसका अपना ही अस्तित्व परमेश्‍वर के बारे में प्रश्‍न को उठा देता है।"

इस प्रश्‍न पर विचार करते हुए, हमारे पास चार सम्भव उत्तर हैं कि क्यों हमारे पास कुछ भी न होने की अपेक्षा क्यों कुछ है :
1. वास्तविकता एक माया है।
2. वास्तविकता स्वयं-सृजित है/थी।
3. वास्तविकता स्वयं-से-अस्तित्व (शाश्‍वतकाल) में है।
4. वास्तविकता किसी से सृजी गई थी, जिसका स्व-अस्तित्व है।

इस कारण, कौन सा सबसे व्यवहारिक समाधान है? आइए वास्तविकता तो बस केवल एक भ्रम है, से आरम्भ करें, जो ऐसी युक्ति जिसमें कई पूर्व धर्मों का विश्‍वास करते हैं। इस विकल्प को दार्शनिक रेने डेकार्ट ने सदियों पहले ही अपने प्रसिद्ध कथन के द्वारा स्वीकार करने से इन्कार कर दिया था, "मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ।" डेकार्ट, एक गणितज्ञ थे, जिन्होंने यह तर्क दिया कि यदि वह सोच रहे हैं, तो उसे अवश्य "होना" चाहिए। दूसरे शब्दों में, "मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं एक माया नहीं हूँ।" माया अर्थात् भ्रम को किसी भ्रम के अनुभव करने की आवश्यकता होती है, और इसके अतिरिक्त, आप स्वयं के अस्तित्व को प्रमाणित किए बिना ही अपने अस्तित्व पर सन्देह नहीं कर सकते हैं; यह स्वयं में एक स्वयं-पराजित तर्क है। इसलिए वास्तविकता के एक भम्र होने से समाप्त हो जाता है।

अगला विचार वास्तविकता स्व-सृजित है/थी का है। जब हम दर्शन शास्त्र का अध्ययन करते हैं, तब हम "विश्लेषणात्मक रूप से झूठे" कथनों के बारे में सीखते हैं, जिसका अर्थ है कि वे अपनी परिभाषा से ही झूठे हैं। वास्तविकता के स्व-सृजित होने की सम्भावना सरल कारणों से उन कथनों में से एक है कि कोई वस्तु अपने अस्तित्व से पूर्व नहीं हो सकती है। यदि आपने स्वयं की सृष्टि की है, तब आप स्वयं की सृष्टि करने से पहले अस्तित्व में थे, परन्तु ऐसा बिल्कुल भी नहीं हो सकता है। विकासवाद में इसे कई बार विकास में इसे कभी-कभी " नैसर्गिक पीढ़ी" के रूप में उद्धृत किया जाता है — अर्थात् कुछ भी नहीं में से कुछ आ रहा है — यह एक ऐसी स्थिति जिसमें कुछ, यदि कोई हो तब, उत्तरदायी लोग किसी बात को केवल इसलिए थामे रहते हैं, क्योंकि आप शून्य में से कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकते हैं। यहाँ तक कि नास्तिक डेविड ह्यूम ने भी यह कहा है कि, "मैंने कभी ऐसा कोई पूर्वकल्पित प्रस्ताव नहीं दिया है, कि कोई बात बिना किसी कारण के उत्पन्न हो सकती है।" चूँकि कोई वस्तु कुछ भी नहीं में से नहीं आ सकती है, इसलिए वास्तविकता का स्वयं-सृजित विकल्प भी समाप्त हो जाता है।

अब हमारे पास केवल दो ही चुनाव रह जाते हैं — एक शाश्‍वतकालीन वास्तविकता या वास्तविकता को किसी ऐसे ने निर्मित किया है जो शाश्‍वतकालीन है : एक वास्तविकता ब्रह्माण्ड या एक शाश्‍वतकालीन सृष्टिकर्ता । 18वीं शताब्दी के धर्मशास्त्री जोनाथन एडवर्ड ने इस चौराहे को इस तरह अभिव्यक्त किया :
• किसा का अस्तित्व है।
• शून्य कुछ भी निर्मित नहीं कर सकता है।
• इसलिए, एक आवश्यक और शाश्‍वतकालीन "कुछ" अस्तित्व में है।

ध्यान दें, हमें इस शाश्‍वतकालीन "कुछ" की ओर वापस चले जाना चाहिए। नास्तिक जो ईश्‍वर में विश्‍वास करने वाले को सनातन सृष्टिकर्ता में विश्‍वास करने के लिए उपहास उड़ाते हैं, को मुड़ना चाहिए और एक शाश्‍वतकालीन ब्रह्माण्ड को अपना लेना चाहिए; यह एकमात्र अन्य के द्वारा है, जिसे वह चुन सकता है। परन्तु अब प्रश्‍न यह उठता है, कि यह प्रमाण किस ओर ले चलते हैं? क्या यह प्रमाण उस पदार्थ के आगे मन या मन के आगे पदार्थ के होने की ओर संकेत करते हैं?

आज की तिथि तक, सभी प्रमुख वैज्ञानिक और दार्शनिक प्रमाण एक शाश्‍वतकालीन ब्रह्माण्ड से दूर और एक अनन्तकालीन सृष्टिकर्ता की ओर संकेत कर रहे हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, ईमानदार वैज्ञानिकों ने यह स्वीकार किया कि ब्रह्माण्ड का आरम्भ था और जिस किसी का आरम्भ है, वह शाश्‍वत नहीं है। दूसरे शब्दों में, जिस किसी भी वस्तु का आरम्भ है, उसके पीछे एक कारक है, और यदि ब्रह्माण्ड का आरम्भ था, तो इसका एक कारक था। यह सच्चाई की ब्रह्माण्ड का आरम्भ था ऐसे प्रमाण के द्वारा मूल्यहीन हो जाता है, जैसे कि 1900वीं शताब्दी के आरम्भ में ऊष्मागतिकी के द्वितीय सिद्धान्त, ब्रह्माण्ड के बड़े धमाके की विकिरणीय गूँज की खोज हुई थी, सच्चाई यह है कि ब्रह्माण्ड का विस्तार हो रहा है और इसकी खोज अतीत के एकल आरम्भ, और आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धान्त में देखी जा सकती है। ये सभी यही प्रमाणित करते हैं, कि ब्रह्माण्ड शाश्‍वतकालीन नहीं है।

इसके अतिरिक्त, ऐसे सिद्धान्त जो कार्य-करण के चारों ओर घुमते हैं, वे सभी ब्रह्माण्ड के अन्तिम कारक होने के विरूद्ध बात करते हैं, जिसे हम सभी इस सरल तथ्य के लिए जानते हैं : कि प्रभाव को उसके कारक के अनुरूप होना चाहिए। यह सत्य होने के कारण, कोई भी नास्तिक यह स्पष्ट नहीं कर सकता कि एक व्यक्तित्वहीन, उद्देश्यहीन, अर्थहीन, और अनैतिक ब्रह्माण्ड ने कैसे अकस्मात् प्राणियों (अर्थात् हमें) की सृष्टि कर दी जो व्यक्तित्व से भरे हुए हैं और जिनके मनों में उद्देश्य, अर्थ और नैतिकता सन्निहित हैं। इस तरह की बात, कारण की दृष्टि से, एक प्राकृतिक ब्रह्माण्ड के द्वारा सब कुछ के उत्पन्न होने के विचार का पूरी तरह से खण्डन कर देती है, जो कि अस्तित्व में है। इस तरह से अन्त में, एक अनन्त ब्रह्माण्ड की अवधारणा ही समाप्त हो जाती है।

दार्शनिक जे. एस. मिल (जो एक मसीही विश्‍वासी नहीं हैं) ने इस बात को सारांशित किया है कि हम अब कहाँ आ गए हैं : "यह स्वयं-में-स्पष्ट है कि केवल मन ही मन को निर्मित कर सकता हैं।" एकमात्र तर्कसंगत और उचित निष्कर्ष यह है, कि एक सनातन सृष्टिकर्ता ही है जो वास्तविकता के लिए उत्तरदायी है जैसा कि हम इसे जानते हैं । या इन कथनों को एक तर्कसंगत सूची में निम्न रूप से ऐसे डाल सकते हैं :
• किसी तत्व का अस्तित्व है।
• आप शून्य में से कुछ प्राप्त नहीं कर सकते हैं।
• इसलिए एक आवश्यक और सनातनकालीन "तत्व" विद्यमान है।
• केवल दो ही विकल्प एक शाश्‍वतकालीन बह्माण्ड और एक शाश्‍वतकालीन सृष्टि मिलते हैं।
• विज्ञान और दर्शन ने शाश्‍वतकालीन ब्रह्माण्ड की अवधारणा को अप्रमाणित ठहरा दिया है।
• इसलिए, एक शाश्‍वतकालीन सृष्टिकर्ता विद्यमान है।

भूतपूर्व नास्तिक ली स्ट्रोबेल, जो कई वर्षों पहले इस अन्तिम परिणाम पर पहुँचे थे, ने यह टिप्पणी की है, "वास्तव में, मुझे पता चल गया है, कि एक नास्तिक बने रहने के लिए, मुझे विश्‍वास करना होगा कि शून्य सब कुछ को उत्पन्न करता है; जीवनरहित जीवन को उत्पन्न करता है; यादृच्छिकता सही विवरण को उत्पन्न करती है; उलझन सूचना को उत्पन्न करती है; अचेतन चेतना को उत्पन्न करता है; और कारण-हीनता कारण को उत्पन्न करता है। विश्‍वास की ये उड़ान विशेष रूप से ईश्‍वर के अस्तित्व के लिए सकारात्मक विषयों के प्रकाश में स्वीकार करने के लिए बहुत बड़ी थी... दूसरे शब्दों में, मेरे मूल्यांकन में मसीही वैश्विक दृष्टिकोण नास्तिक विश्‍वदृष्टि की तुलना में प्रमाणों की पूर्णता के लिए उत्तरदायी थे।"

परन्तु अगला प्रश्‍न जिसका हमें सामना करना चाहिए वह यह है कि: यदि किसी सनातन सृष्टिकर्ता का अस्तित्व है (और हमने दिखाया है कि वह विद्यमान है), तब वह किस प्रकार का सृष्टिकर्ता है? क्या हम जो कुछ उसने सृजा है, उसके उसकी सूचना को प्राप्त कर सकते हैं? दूसरे शब्दों में, क्या हम इसके प्रभावों को इसके कारण से समझ सकते हैं? इसका उत्तर हाँ में है, हम निम्न विशेषताओं के साथ इसे सारांशित कर सकते हैं :

• उसे अवश्य ही अपनी प्रकृति में अलौकिक होना चाहिए (जैसा कि उसने समय और स्थान की सृष्टि की है)।

• उसे (अत्यधिक) सामर्थी होना चाहिए।

• उसे (स्व-अस्तित्व) शाश्‍वतकालीन होना चाहिए।

• उसे सर्वउपस्थित होना चाहिए (उसने स्थान को निर्मित किया है और वह इसके द्वारा सीमित नहीं किया जा सकता है)।

• उसे समयहीन और परिवर्तनहीन (उसने समय की सृष्टि की है) होना चाहिए।

• उसे अभौतिक होना चाहिए क्योंकि वह स्थान/संसार से परे है।

• उसे व्यक्तिगत् होना चाहिए (व्यक्तित्वहीन व्यक्तित्व की रचना नहीं कर सकता है)।

• उसे असीमित और एकल होना चाहिए क्योंकि दो असीमित तत्व एक साथ नहीं हो सकते हैं।

• उसे विविध होना चाहिए तथापि उसमें एकता होनी चाहिए क्योंकि एकता और विविधता स्वभाव में विद्यमान रहती हैं।

• उसे बुद्धिमान (सर्वोच्चता के साथ) होना चाहिए। केवल ज्ञान-सम्बन्धी ही ज्ञान-सम्बन्धी को उत्पन्न कर सकता है।

• उसे उद्देश्यपूर्ण होना चाहिए क्योंकि उसने स्वेच्छा से सब कुछ की रचना की है।

• उसे नैतिक होना चाहिए (कोई नैतिक व्यवस्था इसे देने वाले के बिना नहीं हो सकती है)।

• उसे चिन्ता करने वाला होना चाहिए (अन्यथा कोई नैतिक व्यवस्था नहीं दी जा सकती है)।

ये बातें सत्य होने के कारण, हम यह पूछ सकते हैं, कि क्या कोई ऐसा धर्म है, जो इस संसार में इस तरह के एक सृष्टिकर्ता का विवरण देता है। इसका उत्तर हाँ में है : बाइबल का परमेश्‍वर इस सूची के अनुरूप पूर्ण रूप से पाया जाता है। वह अलौकिक (उत्पत्ति 1:1), शक्तिशाली (यिर्मयाह 32:17), शाश्‍वतकालीन (भजन संहिता 90:2), सर्वउपस्थित (भजन संहिता 139:7), समयहीन/परिवर्तनहीन (मलाकी 3:6), अभौतिक (यूहन्ना 5:24), व्यक्तिगत् (उत्पत्ति 3:9), आवश्यक (कुलुस्सियों 1:17), असीमित/एकल (यिर्मयाह 23:24, व्यवस्थाविवरण 6:4), विविध तथापि एकता के साथ (मत्ती 28:19), बुद्धिमान (भजन संहिता 147:4-5), उद्देश्यपूर्ण (यिर्मयाह 29:11), नैतिक (दानिय्येल 9:14), और चिन्ता करनेवाला (1 पतरस 5:6-7) परमेश्‍वर है।

परमेश्‍वर के अस्तित्व के सम्बन्ध में एक अन्तिम विषय यह है, कि कैसे एक नास्तिक का दृष्टिकोण वास्तव में न्यायसंगत है। चूँकि नास्तिक यह दावा करता है, कि एक मसीही विश्‍वासी का दृष्टिकोण सही नहीं है, इसलिए प्रश्‍न पूछने के लिए ही उचित तरीका यह है और इसे पूरी तरह से घुमा दीजिए और वापस उसी से ही पूछिए। समझने वाली पहली बात यह है कि नास्तिक का दावा — "कोई ईश्‍वर नहीं है", जिससे "नास्तिक" का अर्थ यह है कि — दार्शनिक दृष्टिकोण से इस विचार को थामे रहना असमर्थनीय है। जैसा कि कानून व्यवस्था का एक विद्वान और दार्शनिक मोर्टिमर एडलर ऐसे कहते हैं, "एक सकारात्मक अस्तित्ववादी पूर्वधारणा को प्रमाणित किया जा सकता है, परन्तु एक नकारात्मक अस्तित्ववादी पूर्वधारणा को — जो तत्व के अस्तित्व को नकार देता है — प्रमाणित नहीं किया जा सकता है।" उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति दावा कर सकता है कि एक लाल उकाब विद्यमान है और कोई दूसरा व्यक्ति यह कह सकता है कि लाल उकाब विद्यमान नहीं है। पहले वाले को मात्र एक ही लाल उकाब को ढूंढ़ कर अपने दावे को प्रमाणित करने की आवश्यकता है। लेकिन दूसरे को पूरे ब्रह्माण्ड की खोज करनी होगी और शाब्दिक रूप से प्रत्येक पर एक बार तो अवश्य ही यह सुनिश्चित करने के लिए जाना होगा कि कहीं वह किसी समय किसी स्थान पर लाल उकाब को देखने में रह तो नहीं गया जैसा करना असम्भव सी बात है। यही कारण है कि बौद्धिक रूप से ईमानदार नास्तिक यह स्वीकार करेंगे कि वे यह प्रमाणित नहीं कर सकते कि ईश्‍वर का अस्तित्व नहीं हैं।

इसके पश्चात्, इस विषय को समझना महत्वपूर्ण है जो सत्य के दावों की गम्भीरता के चारों ओर घूमते हैं और निश्चित निष्कर्षों के अधिकार साक्ष्यों की मात्रा के लिए आवश्यक हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई आपके सामने नींबू पानी के दो डिब्बे रख देता है और कहता है कि एक दूसरे की तुलना में अधिक खट्टा हो सकता है, चूँकि अधिक खट्टे पेय को पीने के परिणाम गम्भीर नहीं होंगे, इसलिए आपको अपनी पसन्द का निर्णय लेने में बड़ी सँख्या में साक्ष्यों की आवश्यकता नहीं होगी। तथापि, यदि स्वागतकर्ता एक डिब्बे में एक प्याला चीनी और दूसरे में चूहे मारने वाला जहर मिलाते हुए आपको यह प्रस्तुत करता है, तब आपको अपने निर्णय के लिए बहुत अधिक प्रमाण की आवश्यकता होगी।

यह वही स्थान है जहाँ पर एक व्यक्ति तब बैठता है जब वह ईश्‍वर में नास्तिकता और आस्तिकता के मध्य में निर्णय लेता है। चूँकि नास्तिकता में विश्‍वास सम्भवतः न ही अपूरणीय और अनन्तकालीन परिणामों का परिणाम हो सकता है, इसलिए ऐसा आभासित होता है, कि नास्तिक को अपने दृष्टिकोण के समर्थन में भारी और व्यापक प्रमाण के समर्थन के साथ तैयार करना अनिवार्य है, परन्तु वह ऐसा नहीं कर सकता है। नास्तिकवाद अपने द्वारा लगाए जाने वाले आरोपों की गम्भीरता के लिए प्रमाण दिए जाने की जाँच को पूरा नहीं कर सकता। इसकी अपेक्षा, नास्तिक और जिन लोगों ने उसे अपने विचारों से उत्तरहीन कर दिया है, धीरे से अनन्तकाल से उल्टी दिशा में चले जाते हैं और यह आशा करते हैं, कि उन्हें कोई ऐसा अप्रिय सत्य नहीं मिलेगा कि अनन्त काल वास्तव में अस्तित्व में है। जैसा कि मोर्टिमर एडलर कहते हैं, "परमेश्‍वर को स्वीकार करने या इन्कार करने के कारण जीवन और कार्यों से किसी भी अन्य मूलभूत प्रश्‍न की तुलना में बहुत अधिक परिणाम निकल कर सामने आ जाते हैं।"

इस तरह से, क्या ईश्‍वर पर विश्‍वास करने लिए बौद्धिक अधिपत्र पाया जाता है? क्या ईश्‍वर के अस्तित्व के लिए तर्कसंगत, तार्किक और तर्कपूर्ण तर्क पाया जाता है? पूर्ण रूप से यह पाया जाता है । जबकि नास्तिक जैसे कि फ्रायड का दावा है, कि वे जो लोग ईश्‍वर पर विश्‍वास रखते हैं, वे इच्छा-पूर्ति की इच्छा रखते हैं, कदाचित् यह फ्रायड और उनके अनुयायी हैं, जो वास्तव में इच्छा-पूर्ति की इच्छा से भरे हुए हैं: अर्थात् यह आशा और इच्छा कि कोई ईश्‍वर नहीं है, न ही कोई जबाबदेही है, और इसलिए किसी तरह का कोई दण्ड नहीं है। परन्तु फ्रायड के खण्डन के लिए बाइबल का ईश्‍वर है, जो अपने अस्तित्व की पुष्टि करता है और तथ्य यह है कि एक न्याय वास्तव में उन लोगों के लिए आ रही है जो स्वयं अपने भीतर से सत्य जानते हैं कि वह विद्यमान है परन्तु वे इस सच्चाई को दबा (रोमियों 1:20) देते हैं। परन्तु वे जो इस प्रमाण के प्रति प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं कि एक सृष्टिकर्ता का वास्तव में अस्तित्व है, वह उन्हें उद्धार के तरीके का प्रस्ताव देता है, जिसे उसके पुत्र यीशु मसीह के द्वारा पूरा किया गया है : "परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्‍वर की सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात् उन्हें जो उसके नाम पर विश्‍वास रखते हैं। वे न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्‍वर से उत्पन्न हुए हैं" (यूहन्ना 1:12-13)।

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