बाइबल को मेरे जीवन में लागू करने की कुँजी क्या है?


प्रश्न: बाइबल को मेरे जीवन में लागू करने की कुँजी क्या है?

उत्तर:
बाइबल को जीवन में लागू करना सभी मसीही विश्‍वासियों का कर्तव्य है। यदि हम इसे लागू नहीं करते हैं, तो बाइबल हमारे लिए एक सामान्य पुस्तक, पुरानी पाण्डुलिपियों का एक अव्यवहारिक संग्रह से अधिक कुछ नहीं रह जाती है। यही कारण है कि पौलुस कहता है, "जो बातें तुम ने मुझ से सीखीं, और ग्रहण कीं, और सुनीं, और मुझ में देखीं, उन्हीं का पालन किया करो — तब परमेश्‍वर जो शान्ति का सोता है तुम्हारे साथ रहेगा" (फिलिप्पियों 4:9)। जब हम बाइबल को लागू करते हैं, तो परमेश्‍वर स्वयं हमारे साथ होता है।

हमारे जीवन में परमेश्‍वर के वचन को लागू करने की दिशा में पहला कदम इसका पठ्न है। पढ़ने में हमारा लक्ष्य परमेश्‍वर को जानना, उसके तरीकों को सीखना, और इस संसार के लिए और व्यक्तिगत रूप से उसके उद्देश्य को समझना है। बाइबल पढ़ने से, हम पूरे इतिहास में मानवता के साथ परमेश्‍वर के द्वारा किए हुए वार्तालाप, उसकी छुड़ौती की योजना, उसकी प्रतिज्ञा और उसके चरित्र के बारे में सीखते हैं। हम देखते हैं कि मसीही जीवन कैसा दिखाई देता है। परमेश्‍वर का ज्ञान जो हम पवित्रशास्त्र से प्राप्त करते हैं, वह जीवन में बाइबल के धर्मसिद्धान्तों को लागू करने के लिए एक अमूल्य आधार के रूप में कार्य करता है।

हमारा अगला लक्ष्य जिसे भजनहार अपने मन में परमेश्‍वर के वचन को "रख" छोड़ना के रूप में सन्दर्भित करता है: "मैं ने तेरे वचन को अपने हृदय में रख छोड़ा है, कि तेरे विरुद्ध पाप न करूँ" (भजन संहिता 119:11)। वह तरीका जिसमें हम अपने मन में परमेश्‍वर के वचन को "रख" छोड़ते हैं, जैसा कि हमने पहले पढ़ा है, उस का अध्ययन करना, उसे याद रखना और उस पर ध्यान मनन करना इत्यादि है। ये चार कदम — पढ़ना, अध्ययन करना, याद रखना और ध्यान मनन करना — हमारे जीवन में पवित्रशास्त्र को सफलतापूर्वक लागू करना को सम्भव बनाते हैं।

अध्ययन करना: अध्ययन करते समय निश्‍चित रूप से पढ़ना सम्मिलित होता है, पढ़ना अध्ययन के समान नहीं है। परमेश्‍वर के वचन का अध्ययन करने का अर्थ है कि हम किसी विशेष व्यक्ति, विषय, सन्दर्भ, अनुच्छेद या बाइबल की पुस्तक पर उन्नत ज्ञान को प्राप्त करने के लिए प्रार्थना और समय व्यतीत करने के ऊपर अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं। बाइबल की टिप्पणियों और प्रकाशित बाइबल अध्ययनों सहित अध्ययन संसाधनों का एक बहुत बड़ा समूह उपलब्ध है, जो हमें परमेश्‍वर के वचन के "ठोस भोजन" (इब्रानियों 5:12-14) के उत्सव में सम्मिलित होने के लिए सक्षम बनाता है। हम इन संसाधनों के साथ स्वयं को परिचित कर सकते हैं, फिर एक विषय, एक सन्दर्भ, या एक पुस्तक को चुन सकते हैं, जो हमारी रुचियों को चित्रित करता है और इसमें अध्ययन के लिए प्रवेश कर सकते हैं।

याद करना: उस बात को लागू करना असम्भव है, जिसे हम याद नहीं कर सकते हैं। यदि हम अपने मन में वचन को "रख" छोड़ने जा रहे हैं, तो हमें इसे वहाँ तक पहुँचने के लिए सबसे पहले याद रखना होगा। याद करने से पवित्रशास्त्र हमारे भीतर एक सोते को उत्पन्न करता है, जिससे हम लगातार जल प्राप्त कर सकते हैं, विशेषकर कभी-कभी जब हम अपनी बाइबल को पढ़ने में सक्षम नहीं होते हैं। ठीक वैसे ही जैसे हम भविष्य के उपयोग के लिए धन और अन्य सांसारिक सम्पत्तियों को एकत्र करते हैं, हमें "इसलिए ये वचन अपने अपने मन और प्राण में धारण किए रखना" है (व्यवस्थाविवरण 11:18, बी एस आई हिन्दी की बाइबल)। पवित्रशास्त्र के वचनों को प्रत्येक सप्ताह स्मरण करने के लिए एक योजना बनाएँ।



ध्यान मनन करना
: लेखक और दार्शनिक एडमंड बर्क ने एक बार कहा था, "चिन्तन किए बिना पढ़ना मानो ऐसा है, जैसे पचाए बिना भोजन करना।" हम "पचाए" बिना परमेश्‍वर के वचन को "खाने" का जोखिम नहीं उठा सकते हैं। चार तरह की मिट्टी के दृष्टान्त में (मत्ती 13:3-9; की तुलना इन 18-23 वचनों से करें), यीशु एक बीज बोने वाले के बारे में बताता है, जो अपने खेत में बीज बोने के लिए निकलता है, परन्तु वह केवल यह पाता है कि कुछ बीज — परमेश्‍वर का वचन (मत्ती 13:19) — "कुछ बीज पथरीली भूमि पर गिरे, जहाँ उन्हें बहुत मिट्टी न मिली और गहरी मिट्टी न मिलने के कारण वे जल्द उग आए। पर सूरज निकलने पर वे जल गए, और जड़ न पकड़ने से सूख गए" (13:5-6)। यहाँ, यीशु कहता है, वह उस व्यक्ति के समान है, जिसमें वचन बोया जाता है, परन्तु वह जड़ नहीं पकड़ता है (13:20-21)।

भजन संहिता 1:2 कहता है कि जो मनुष्य परमेश्‍वर के वचन पर मनन करता है, वह धन्य है। डोनाल्ड एस व्हिटनी, अपनी पुस्तक आत्मिक मसीही जीवन के लिए मसीही अनुशासन में लिखते हैं कि, "आपके आत्मिक जीवन का वृक्ष मनन करने के द्वारा उत्तम रीति से बढ़ता है, क्योंकि यह आपको परमेश्‍वर के वचन के पानी को अवशोषित करने में सहायता प्रदान करता है (इफिसियों 5:26)। उदाहरण के लिए, बाइबल को मात्र सुनना या पढ़ना, कठोर भूमि पर हुई थोड़ी वर्षा के जैसे हो सकता है। वर्षा की मात्रा या तीव्रता के होने के पश्‍चात् भी अधिकांश लोग भाग कर बच जाते हैं और थोड़ा ही इसमें भिगते हैं। मनन आत्मा की भूमि को खोल देता है और होने देता है कि परमेश्‍वर के वचन का पानी मन की गहराई तक चला जाए। इसका परिणाम एक असाधारण फलदायी और आत्मिक समृद्धि में निकलता है" ( पृष्ठ 49-50)।

यदि हम अपने जीवन में "जड़ पकड़ने" की इच्छा रखते हैं, ताकि हम एक ऐसी फसल उत्पन्न कर सकें जो परमेश्‍वर को प्रसन्न करे (मत्ती 13:23), तो हम जो कुछ बाइबल में पढ़ते और अध्ययन करते हैं, उस के ऊपर हमें विचार करना चाहिए, चिन्तन करना चाहिए और मनन करना चाहिए। जब हम मनन करते हैं, तब हम स्वयं से निम्न कुछ प्रश्नों को पूछ सकते हैं:
1. यह सन्दर्भ मुझे परमेश्‍वर के बारे में क्या सिखाता है?
2. यह सन्दर्भ मुझे कलीसिया के बारे में क्या सिखाता है?
3. यह सन्दर्भ मुझे संसार के बारे में क्या सिखाता है?
4. यह सन्दर्भ मुझे अपने बारे में क्या सिखाता है? अपनी इच्छाओं और उद्देश्यों के बारे में क्या सिखाता है?
5. क्या यह सन्दर्भ चाहता है कि किसी गतिविधि को करूँ? यदि हाँ, तो मुझे क्या कदम उठाना चाहिए?
6. मुझे अंगीकार करने और/या पश्‍चाताप करने की क्या आवश्यकता है?
7. इस सन्दर्भ से मैंने क्या सीखा है, जो मुझे परमेश्‍वर पर ध्यान केन्द्रित करने और उसकी महिमा को ले आने के लिए प्रयास करने में सहायता करेगा?

लागू करना: हम जिस स्तर में अध्ययन करते, याद करते, और परमेश्‍वर के वचन पर मनन करते हैं, हम उसी स्तर पर इसे समझते हैं कि इसे कैसे अपने जीवन पर लागू करना है। परन्तु यह समझ कि वचन कैसे लागू होता है, पर्याप्त नहीं है; हमें वास्तव में इसे लागू करना चाहिए (याकूब 1:22)। "लागू करना" का तात्पर्य कार्य करने से है और आज्ञाकारीता से भरा हुआ कार्य हमारे जीवन में परमेश्‍वर के वचन से भरने के लिए अन्तिम चरण है। पवित्रशास्त्र को जीवन में लागू करना हमारे अध्ययन को आत्म जागृत करता है और आगे बढ़ता है, और यह हमारी समझ को तेज करने में भी सहायता प्रदान करता है, जिससे हमें अच्छे और बुरे के बीच अच्छी तरह से अन्तर करने में सहायता प्राप्त होती है (इब्रानियों 5:14)।

अन्तिम शब्दों के रूप में, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि हम अपने जीवन में परमेश्‍वर के वचन को समझने और लागू करने के प्रयास में अकेले नहीं हैं। परमेश्‍वर ने हमें अपनी आत्मा से भर दिया है (यूहन्ना 14:16-17) जो हमसे बात करता है, हमें सच्चाई में चलने और सत्य के मार्गदर्शन में बने रहने में सहायता देता है (यूहन्ना 16:13)। इस कारण, पौलुस विश्‍वासियों को "आत्मा से चलने" के लिए प्रेरित करता है (गलतियों 5:16), क्योंकि वह आवश्यकता के समय में बहुत ही अधिक सहायता देने वाला होता (भजन संहिता 46:1)! आत्मा बड़ी विश्‍वासयोग्यता से हमें परमेश्‍वर की इच्छा में मार्गदर्शन करेगा, सदैव हमें सही कार्य को करने के लिए प्रेरित करता है (यहेजकेल 36:26-28; फिलिप्पियों 2:13)। बाइबल में लिखे गए सभी वचनों के अनुसार जीवन को यापन करने के लिए पवित्र आत्मा से अच्छा शिक्षक कौन हो सकता है, क्योंकि स्वयं उसने बाइबल को लिखने के लिए प्रेरित किया था — स्वयं पवित्र आत्मा ने? इसलिए, आइए हम अपने मन में वचन को रख छोडें और पवित्र आत्मा का पालन करते हुए अपने जीवन को उसे समर्पित कर दें, क्योंकि वही है जो हमारे जीवन में से वचन को बाहर ले आता है।

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