धर्मत्याग क्या है और मैं इसे कैसे पहचान सकता हूँ?



प्रश्न: धर्मत्याग क्या है और मैं इसे कैसे पहचान सकता हूँ?

उत्तर:
धर्मत्याग, यूनानी शब्द अपोसटासिया नामक शब्द से निकल है, जिसका अर्थ "एक स्थापित पद्धति या अधिकार; विद्रोह; एक परित्याग या विश्‍वास का उल्लंघन करने से है।" पहली-शताब्दी के संसार में धर्मत्याग राजनीतिक विद्रोह या पक्षपात के लिए उपयोग में आने वाला एक तकनीकी शब्द था। और पहली शताब्दी की तरह ही धर्मत्याग आज भी मसीह की देह को खतरे में डाल देता है।

बाइबल एरियस (250 — 336 ईस्वी सन्) जैसे लोगों के बारे में चेतावनी देते हैं, जो मिस्र के सिकन्दरिया का एक मसीही पुरोहित था, जिसने चौथी शताब्दी के आरम्भ में अन्ताकिया में प्रशिक्षण को प्राप्त किया था। लगभग 318 ईस्वी सन् में एरियस पर एक भ्रान्त शिक्षा सेबेल्युसवाद का अनुसरण करने के कारण सिकन्दरिया के बिशप सिकंदर ने आरोप लगाया था, इस झूठी शिक्षा के अनुसार इस बात को महत्व दिया गया था कि पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा केवल समय-समय पर परमेश्‍वर द्वारा ग्रहण की गई भूमिकाएँ या कलाएँ थीं। एरियस ने परमेश्‍वर की एकता पर महत्व देने का निर्णय लिया; यद्यपि, वह परमेश्‍वर के स्वभाव के ऊपर अपने शिक्षण में बहुत अधिक दूर चला गया। एरियस ने त्रिएकत्व को इन्कार कर दिया, जिस शिक्षा को परिचित कराया वह सतही रूप में पिता और पुत्र के मध्य एक अप्रासंगिक अन्तर होने का आरम्भ थी।

एरियस ने तर्क दिया कि यीशु पिता के रूप में होमोऊसिएन अर्थात् एकतत्व (का एक सार) नहीं था, अपितु होमोईऊसिएन समतत्व (के जैसा सार) था। केवल एक ही यूनानी अक्षर — अयोटा (ई) — ने दोनों के लिए उपयोग होने वाले यूनानी शब्दों के मध्य में आकर इन दोनों को पृथक कर दिया था। एरियस अपने दृष्टिकोण को इस तरह से प्रस्तुत करता है : "पिता पुत्र से पहले अस्तित्व में था। एक समय था जब पुत्र अस्तित्व में नहीं था। इसलिए, पुत्र को पिता द्वारा सृजा गया था। इसलिए, यद्यपि, पुत्र सारी सृष्टि में सबसे सर्वोच्च था, वह परमेश्‍वर का एक तत्व नहीं था।"

एरियस बहुत ही चतुर था और उसने लोगों को अपने पक्ष में करने के लिए अपने सर्वोत्म प्रयासों को उपयोग किया, यहाँ तक कि उसने छोटे छोटे गीतों को निर्मित किया ताकि वह अपने धर्मविज्ञान की शिक्षा दे सके, जिसे उसने प्रत्येक उस को सीखने के लिए उपयोग किया, जो उसकी बात को सुनते थे। उसका बुद्धिमानी से भरा हुआ स्वभाव और प्रचारक के रूप में पूजनीय पद और एक ऐसे व्यक्ति के स्वरूप जो आत्म त्याग के जीवन को व्यतीत करता है, इत्यादि ने मिलकर उसकी शिक्षा के प्रसार में उसका योगदान दिया।

धर्मत्याग के सम्बन्ध में, यह महत्वपूर्ण है कि सभी मसीही विश्‍वासी दो महत्वपूर्ण बातों को समझें : (1) धर्मत्याग और धर्मत्याग किए हुए शिक्षकों की पहचान कैसे की जाए, और (2) क्यों धर्मत्याग वाली शिक्षा इतनी अधिक खतरनाक है।

धर्मत्याग के प्रकार
धर्मत्याग को पूर्ण रीति से समझने और इसके विरूद्ध संघर्षरत् होने के लिए, यह महत्वपूर्ण है कि मसीही विश्‍वासी इसके विभिन्न प्रकारों और गुणों को समझे जो इसके धर्मसिद्धान्तों और शिक्षकों की व्याख्या करते हैं। जब बात धर्मत्याग के प्रकारों की आती है, तब एक व्यक्ति इसके दो मुख्य प्रकारों को पाता है : (1) बाइबल के प्रमुख और सच्चे धर्मसिद्धान्तों से भ्रान्त शिक्षाओं में गिर जाना जो स्वयं को "वास्तविकता" मसीही धर्मसिद्धान्त होने की घोषणा करते हैं, और (2) मसीही विश्‍वास का पूर्ण रीति से त्याग जिसका परिणाम मसीह को पूर्ण रूप से त्याग कर देने में होता है।

एरियस ने धर्मत्याग के प्रथम स्वरूप को प्रस्तुत किया — मसीही विश्‍वास के मुख्य सत्यों का इन्कार करना (जैसे कि मसीह के ईश्‍वरत्व का) जिससे विश्‍वास से पूर्ण रीति से छोड़ना आरम्भ होता है, जो कि धर्मत्याग का दूसरा रूप है। यह समझना अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि दूसरे प्रकार का रूप सदैव ही पहले प्रकार से ही आरम्भ होता है। एक भ्रान्त मान्यता एक भ्रान्त शिक्षा बन जाती है, जो तब तक बिखरती रहती और वृद्धि करती है, जब तक कि यह एक व्यक्ति के विश्‍वास के सभी पहलुओं को नकार न दे और तत्पश्चात् शैतान का अन्तिम लक्ष्य पूरा हो जाता है, जो कि मसीही विश्‍वास से पूरी तरह फिर जाना होता है।

इस प्रक्रिया का अभी वर्तमान में घटित होने वाला एक उदाहरण एक प्रमुख नास्तिक डैनियल डेनेट और लिंडा लासकोला द्वारा 2010 में किया गया एक अध्ययन "प्रचारक जो विश्‍वासी नहीं हैं" पाया जाता है। डेनेट और लासकोला के लेख पाँच भिन्न प्रचारकों के ऊपर लिखे हुए हैं, जिन्होंने समय के साथ मसीही विश्‍वास को पाश्चात्य शिक्षाओं के साथ प्रस्तुत किया और अब भ्रान्त अर्थात् झूठी शिक्षाओं को स्वीकार करते हैं और इस समय पूरी तरह से विश्‍वास से दूर हो गए हैं और या तो वे बहुदेववादी या गुप्त नास्तिकवादी हैं। अध्ययन में सबसे अधिक परेशान करने वाले सत्यों में से एक यह है कि ये प्रचारक मसीही कलीसियाओं में अपने पद को यथास्थिति बनाए हुए हैं और उनकी मण्डलियाँ उनके अगुवे की सच्ची आत्मिक अवस्था से अज्ञात् हैं।

यहूदा की पुस्तक में धर्मत्याग के खतरे के प्रति चेतावनी दी गई है, जो कि जो डेनेट और लासकोला के अध्ययन में लिखी गई धर्म-त्यागियों की विशेषताओं को समझने के लिए एक हस्त पुस्तिका के रूप में कार्य करती है। यहूदा की पत्री के प्रत्येक शब्द आज हमारे लिए उतने ही प्रासंगिक हैं, जैसे कि वे जब पहली शताब्दी में उन्हें लिखे थे, तब महत्वपूर्ण थे कि हम उन्हें सावधानी से पढ़ें और समझें।

धर्मत्याग और धर्मत्याग करने वाले प्रचारकों के लक्षण
यहूदा यीशु का सौतेला भाई और आरम्भिक कलीसिया का एक अगुवा था। नए नियम में लिखे हुए अपने पत्र में, वह इस रूपरेखा को प्रस्तुत करता है कि धर्मत्याग की पहचान कैसे की जाए और दृढ़ता के साथ मसीह की देह में उन लोगों को विश्‍वास में पूरे यत्न से बने रहने की विनती करता है (वचन 3)। जिस यूनानी शब्द जिसका अनुवाद "पूरा यत्न" से बने रहने के लिए अनुवादित हुआ है, वह एक मिश्रित क्रिया है, जिस में से हम शब्द "पीड़ा" को प्राप्त करते हैं। यह क्रिया के सामान्य रूप में पाई जाती है, जिसका अर्थ है कि संघर्ष निरन्तर बना रहेगा। दूसरे शब्दों में, यहूदा यह कह रहा है कि झूठी शिक्षाओं के विरूद्ध संघर्ष निरन्तर चलता रहेगा और यह कि मसीही विश्‍वासियों को इसे इतनी अधिक गम्भीरता से ले लेना चाहिए कि हम उस संघर्ष जिसमें हम सम्मिलित हैं, "पीड़ित" होते हैं। इसके अतिरिक्त, यहूदा यह स्पष्ट कर देता है कि प्रत्येक मसीही विश्‍वासी को इस युद्ध में संघर्षरत् होने के लिए बुलाया गया है, न कि केवल कलीसिया के अगुवों को, इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि सभी मसीही विश्‍वासी अपनी समझ के कौशल को इतना अधिक तीखा कर लें, ताकि वे उनके मध्य उपस्थिति धर्मत्याग की पहचान कर सकें और इसे रोक सकें।

अपने पाठकों को इस बात की विनती कर लेने के पश्चात् कि वे अपने विश्‍वास के ऊपर पूरे यत्न से खड़े रहे, यहूदा इस तर्क की विशेषता को बताता है: "क्योंकि कितने ऐसे मनुष्य चुपके से हम में आ मिले हैं, जिनके इस दण्ड का वर्णन पुराने समय में पहले ही से लिखा गया था : ये भक्तिहीन हैं, और हमारे परमेश्‍वर के अनुग्रह को लुचपन में बदल डालते हैं, और एकमात्र स्वामी और प्रभु यीशु मसीह का इन्कार करते हैं" (वचन 4)। इस एक ही वचन में, यहूदा मसीही विश्‍वासियों को धर्मत्याग और धर्मत्यागी शिक्षकों के तीन गुणों को प्रस्तुत करता है।

प्रथम, यहूदा कहता है कि धर्मत्याग चुपके से आ जाता है। यहूदा इसके लिए "चुपके" शब्द का उपयोग (जो बाइबल की किसी अन्य पुस्तक में नहीं मिलता है) कलीसिया में प्रवेश करने वाले धर्मत्याग का विवरण करने के लिए करता है। अतिरिक्त-बाइबल आधारित यूनानी में, यह शब्द एक अधिवक्ता की चतुराई से भरी हुई चालाकी का वर्णन करती है, जो चतुर तर्कों के माध्यम से, न्यायालय के अधिकारियों के मन के भीतर घुस पैठ कर लेते हैं और उनकी सोच को ही भ्रष्ट कर देते हैं। इस शब्द का शाब्दिक अर्थ है "बचते हुए निकल जाना; चुपके से आना; छिपकर जाना; पता लगाने में कठिनाई का होने" इत्यादि से है। दूसरे शब्दों में, यहूदा कहता है कि ऐसा होना दुर्लभ है कि धर्मत्याग प्रत्यक्ष और आसानी से पता लगाए जाने वाले तरीके से आरम्भ हो। इसकी तुलना में, यह अपने आप में एरियस के उपदेश के उदासीन तरीके की तरह दिखता है, जिसमें यह अपने सिद्धान्त में मसीही विश्‍वास की शिक्षाओं से बहुत कम अन्तर में पृथक है।

धर्मत्याग के इस पहलू और इससे होने वाले खतरे से निकलने वाले परिणामों का वर्णन करते हुए, ए. डब्ल्यू टोज़र ने ऐसे लिखा है, "यह त्रुटि सत्य की नकल करने में इतनी अधिक कुशल है कि दोनों को निरन्तर एक दूसरे के स्थान पर गलत उपयोग में लाया जा रहा है। इन दिनों में इस बात का पता लगाने के लिए तीक्ष्ण दृष्टि की आवश्यकता है कि कौन सा भाई कैन और कौन सा हाबिल है।

प्रेरित पौलुस ने धर्मत्यागियों और उनकी शिक्षाओं के प्रसन्न करने वाले बाहरी दिखावे से भरे हुए व्यवहार के बारे में भी बोला है, जब उसने यह कहा कि, "क्योंकि ऐसे झूठे प्रेरित, और छल से काम करने वाले और मसीह के प्रेरितों का रूप धरने वाले हैं। यह कुछ अचम्भे की बात नहीं क्योंकि शैतान आप ही ज्योतिर्मय स्वर्गदूत का रूप धारण करता है" (2 कुरिन्थियों 11:13-14)। दूसरे शब्दों में, अपने शिक्षण के आरम्भिक दिनों में धर्मत्यागियों का बाहर से बुरा होने को न देखें या उनके साथ पाखण्ड से भरे हुए नाटकीय शब्दों में बात न करें। सत्य को सीधे ही इनकार करने की अपेक्षा धर्मत्यागी इसे अपने स्वयं के उद्देश्यों की प्राप्ति के अनुरूप बना सकते हैं, परन्तु, जैसा कि पास्टर आर. सी. लेन्सकी ने लिखा है, "दुष्टता का सबसे बुरा प्रकार सत्य को विकृत करने में है।"

दूसरा, यहूदा धर्मत्यागियों को "भक्तिहीन" के रूप में वर्णित करता है और ऐसे लोग जो परमेश्‍वर के अनुग्रह को लुचपन करने का अनुज्ञापत्र अर्थात् लाईसेन्स मान लेते हैं। यहूदा धर्मत्यागियों के अठारह स्पष्ट लक्षणों का वर्णन करता है ताकि उसके पाठकों को उनकी पहचान आसानी से हो सके। यहूदा कहता है कि वे धर्मत्यागी "भक्तिहीन (वचन 4, लुच्चे (वचन 4), मसीह का इन्कार करने वाले (वचन 4), शरीर को अशुद्ध करने वाले (वचन 8), विद्रोही (वचन 8), ऐसे लोग जो स्वर्गदूतों को बुरा मानते हैं (वचन 8), जो प्रभुता को तुच्छ जानते हैं (वचन 8), वे झूठे स्वप्नों की घोषणा करते हैं (वचन 10), स्वयं को नष्ट करने वाले (वचन 10), असन्तुष्ट (वचन 16), कुड़कुड़ानेवाले (वचन 16), अभिलाषाओं के पीछे चलने वाले (वचन 16), अपने मुँह से घमण्ड के अनुसार चलनेवाले (वचन 16), परमेश्‍वर को ठट्ठों में उड़ाने वाले (वचन 18), फूट डालने वाले (वचन 19), शारीरिक मन वाले (वचन 19), और अन्त में (बिना किसी आश्चर्यकर्म), आत्मा शून्य/न बचाए हुए लोग (वचन 19)।

तीसरा, यहूदा कहता है कि धर्मत्यागी, "हमारे एकमात्र स्वामी और प्रभु यीशु मसीह का इन्कार" करते हैं। इस कार्य को धर्मत्यागी कैसे करते हैं? पौलुस तीतुस को लिखे हुए अपने पत्र में ऐसे कहता है, "शुद्ध लोगों के लिये सब वस्तुएँ शुद्ध हैं, पर अशुद्ध और अविश्‍वासियों के लिये कुछ भी शुद्ध नहीं, वरन् उनकी बुद्धि और विवेक दोनों अशुद्ध हैं, वे कहते हैं कि हम परमेश्‍वर को जानते हैं, पर अपने कामों से उसका इन्कार करते हैं; क्योंकि वे घृणित और आज्ञा न माननेवाले हैं, और किसी अच्छे काम के योग्य नहीं" (तीतुस 1:15-16, अतिरिक्त प्रभाव को इस वचन में जोड़ा गया है)। अपने भक्तिहीन व्यवहार के द्वारा, धर्मत्यागी अपने स्वयं की सत्य को दर्शा देते हैं। एक धर्मत्यागी के विपरीत, एक सच्चा विश्‍वासी वह व्यक्ति है, जो मसीह में धार्मिकता के लिए पाप से छुटकारा पा चुका है। पौलुस के साथ, वे कहते हैं कि धर्मत्यागी ऐसा व्यक्ति होता है, जो लुचपन से भरे हुए व्यवहार को बढ़ावा देता है, "तो हम क्या कहें? क्या हम पाप करते रहें कि अनुग्रह बहुत हो? कदापि नहीं! हम जब पाप के लिये मर गए तो फिर आगे को उसमें कैसे जीवन बिताएँ?" (रोमियों 6:1-2)।

परन्तु धर्मत्यागी की झूठी शिक्षा साथ ही उनके सच्चे स्वभाव को भी दर्शाती हैं। पतरस कहता है, "जिस प्रकार उन लोगों में झूठे भविष्यद्वक्ता थे, उसी प्रकार तुम में भी झूठे उपदेशक होंगे जो नाश करनेवाले पाखण्ड का उदघाटन छिप छिपकर करेंगे, और उस स्वामी का जिसने उन्हें मोल लिया है इन्कार करेंगे, और अपने आप को शीघ्र विनाश में डाल देंगे" (2 पतरस 2:1)। सच्चे विश्‍वासियों का एक अन्य पहलू यह है कि वे आत्मिक अन्धकार से ज्योति में आने के लिए छुटकारा पाए हुए हैं (इफिसियों 5:8) और इसलिए पवित्रशास्त्र के केन्द्रीय सत्यों को इन्कार नहीं करेंगे जैसे एरियस ने यीशु के ईश्‍वरत्व का ही इन्कार किया था।

अन्तत: एक धर्मत्यागी का चिन्ह यह है कि वह परमेश्‍वर के वचन के सत्य और उसकी धार्मिकता को छोड़कर उससे दूर हो जाता है। प्रेरित यूहन्ना इसे एक झूठे विश्‍वासी के चिन्ह के रूप में इंगित करता है: "वे निकले तो हम ही में से, पर हम में के थे नहीं; क्योंकि यदि वे हम में के होते, तो हमारे साथ रहते; पर निकल इसलिये गए कि यह प्रगट हो कि वे सब हम में के नहीं हैं" (1 यूहन्ना 2:19)।

विचारों के परिणाम होते हैं
यह कि परमेश्‍वर धर्मत्याग और झूठी शिक्षाओं को गम्भीरता से देखता है, जो कि इस तथ्य के द्वारा प्रमाणित है कि नए नियम की फिलेमोन के पत्र को छोड़कर प्रत्येक पुस्तक में झूठी शिक्षाओं के प्रति चेतावनियाँ मिलती हैं। ऐसा क्यों है? सरल शब्दों में कहना क्योंकि विचारों के परिणाम होते हैं। सही सोच और इसके फल भलाई को उत्पन्न करता है, जबकि गलत सोच और इसके साथ किए जाने वाले कार्य का परिणाम न इच्छा किए जाने वाले दण्ड में निकलता है। इसका एक उदाहरण, 1970 के दशक में कम्बोडियन में पाए जाने वाले नरसंहार के क्षेत्र हैं, जो कि जीन पॉल सार्त्रे और उनकी शून्यवाद सम्बन्धी शिक्षा के वैश्विक दृष्टिकोण का परिणाम थे। खमेर रूज के अगुवे पोल पोट ने स्पष्ट और भयावह तरीके से लोगों को सार्त्रे के दर्शन के अनुसार जीवन को व्यतीत करने के लिए मजबूर कर दिया, जिसे इस तरह से व्यक्त किया गया था: "आपको बनाए रखने से कोई लाभ नहीं है। आपको नष्ट कर देने से कोई नुक्सान नहीं है।"

इस बात को स्मरण रखना चाहिए कि शैतान पहले जोड़े के पास बाहरी शास्त्रों या अलौकिक हथियार के साथ वाटिका में नहीं आया था; इसकी अपेक्षा, वह एक विचार के साथ उन पर आया था। और यह वह विचार ऐसा था, जिसने उन्हें और उनके पश्चात् आने वाले मनुष्यों की दण्डित कर दिया, जिसका केवल एकमात्र उपाय परमेश्‍वर के पुत्र की बलिदानात्मक मृत्यु थी।

सबसे बड़ी त्रासदी है कि चाहे जानबूझकर या अनजाने में ही धर्मत्यागी शिक्षक अपने सन्देहरहित अनुयायियों को अन्धकार में छोड़ देता है। पवित्रशास्त्र में सबसे डरावने सन्दर्भों में से एक यीशु के मुँह से आता है। अपने दिनों के धार्मिक अगुवों के बारे में अपने शिष्यों से बात करते हुए, उसने ऐसा कहा, "उन को जाने दो; वे अन्धे मार्गदर्शक हैं और अँधा यदि अन्धे को मार्ग दिखाए, तो दोनों ही गड़हे में गिर पड़ेंगे" (मत्ती 15:14, अतिरिक्त प्रभाव को इस वचन में जोड़ा गया है)। यह वचन सचेत करने वाला है, क्योंकि यीशु पुष्टि करता है कि यह केवल झूठे भविष्यद्वक्ता नहीं हैं, जो नाश की ओर बढ़ रहे हैं, अपितु उनके शिष्य भी उनका अनुसरण कर रहे हैं। मसीही दार्शनिक सोरेन किरिकगार्ड ने इसे इसी बात को कुछ तरह लिखा है: "क्योंकि यह बात कभी भी विफल नहीं हुई है कि जब एक मूर्ख भटक जाता है, तो वह अपने साथ कई अन्य लोगों को भी भटका देता है।"

निष्कर्ष
325 ईस्वी सन् में नीकिया की महासभा ने मुख्य रूप से एरियस और उनकी शिक्षाओं से सम्बन्धित विषय पर चर्चा की। एरियस के लिए सबसे अधिक निराशा का कारण यह हुआ कि इसका अन्तिम परिणाम उन्हें मसीही विश्‍वास से बहिष्कृत किए जाने में हुआ और नीकिया के विश्‍वास वचन में एक अतिरिक्त कथन को जोड़ दिया गया, जो मसीह के ईश्‍वरत्व की पुष्टि करता है : "हम एक परमेश्‍वर, सर्वशक्तिमान पिता पर विश्‍वास करते हैं। वह स्वर्ग और पृथ्वी का और समस्त दृश्य और अदृश्य वस्तुओं का कर्ता है। हम एक प्रभु, यीशु मसीह पर विश्‍वास करते हैं। वह परमेश्‍वर का एकलौता पुत्र, सर्वयुगों से पहले पिता से उत्पन्न, परमेश्‍वर से परमेश्‍वर, ज्योति से ज्योति, सत्य परमेश्‍वर से सत्य परमेश्‍वर, कृत नहीं वरन् उत्पन्न है; उसका और पिता का तत्व एक है।"

हो सकता है कि एरियस शताब्दियों पहले मर गया हो, परन्तु उसकी आत्मिक सन्तान अभी भी आज के दिन तक हमारे साथ यहोवा विटनेसेस अर्थात् यहोवा के साक्षी और कई अन्य तरह की झूठी शिक्षाओं के रूप में जीवित हैं, जो मसीह के सच्चे तत्व और व्यक्तित्व का इन्कार कर देते हैं। दुर्भाग्य से, मसीह के आगमन तक और प्रत्येक अन्तिम आत्मिक शत्रु के हटाए जाने तक, गेहूँ में इस तरह की ऊँटकटारें विद्यमान रहेंगी (मत्ती 13:24-30)। सच्चाई यह है कि पवित्रशास्त्र कहता है कि मसीह के आगमन के निकट होने के साथ ही धर्मत्याग वृद्धि करता चला जाएगा। "तब [अन्तिम दिनों में] बहुत से ठोकर खाएँगे, और एक दूसरे को पकड़वाएँगे, और एक दूसरे से बैर रखेंगे" (मत्ती 24:10)। पौलुस यीशु के इन शब्दों को अपने प्रेरित लेखों में लिखता है। प्रेरित पौलुस ने थिस्सलुनीकियों से कहा कि एक बड़े धर्मत्याग के होने से पहले मसीह का दूसरा आगमन होगा (2 थिस्सलुनीकियों 2:3) और यह कि अन्त के समय का चित्रण महाक्लेश और धर्मरहित धार्मिकता से भरे हुए लोगों के द्वारा होगा : "पर स्मरण रख कि अन्तिम दिनों में कठिन समय आएँगे। क्योंकि मनुष्य...भक्ति का भेष तो धरेंगे पर इसकी शक्ति को न मानंगे, ऐसों से परे रहना" (2 तीमुथियुस 3:1-2,5)।

यह बात पहले से भी कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है कि प्रत्येक विश्‍वासी समझ के लिए प्रार्थना करता, धर्मत्याग के साथ संघर्षरत् होता, और अपने विश्‍वास के लिए पूरा यत्न करता है, जिसे एक ही बार और सदैव के लिए सन्तों को दे दिया गया है।

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