क्या ऐसा कोई स्वर्गदूत है, जिसके हाथों में मृत्यु का अधिकार दिया गया है?



प्रश्न: क्या ऐसा कोई स्वर्गदूत है, जिसके हाथों में मृत्यु का अधिकार दिया गया है?

उत्तर:
"मृत्यु के स्वर्गदूत" का विचार कई धर्मों में विद्यमान है। "मृत्यु के स्वर्गदूत" को यहूदी धर्म में सामैऐल, सारईल, या यस्राइल; इस्लाम में मलक एल्माव्त्; हिन्दू धर्म में यम या यमराज; और लोकप्रिय काल्पनिक कथाओं में ग्रिम रीपर नामक चरित्र के रूप में जाना जाता है। विभिन्न पौराणिक कथाओं में, एक छोटे बच्चे के द्वारा मृत्यु के दूत की कल्पना हँसिया हाथ में लिए हुए एक सुन्दर स्त्री के साथ एक कंकाल की आकृति जैसे किसी स्वरूप के साथ की जाती है। जबकि विवरण भिन्न हो सकते हैं, तथापि, मुख्य मान्यता यही है कि मृत्यु के समय एक व्यक्ति के पास एक प्राणी आता है, या तो वह वास्तव में उसकी मृत्यु का कारण बनता है या केवल उसे देखकर ही मृत्यु आ जाती है — उसका उस व्यक्ति के पास आना उसकी आत्मा को मृतकों के लोक में ले जाने के उद्देश्य से होता है।

बाइबल में "मृत्यु के स्वर्गदूत" की अवधारणा की शिक्षा नहीं दी जाती है। बाइबल कहीं पर यह शिक्षा नहीं देती है कि विशेष रूप से कोई एक स्वर्गदूत ठहराया गया है, जिसके हाथों में मृत्यु का अधिकार दिया गया है, या वह तब उपस्थित होता है, जब कभी भी किसी की मृत्यु होती है। दूसरा राजा 19:35 एक स्वर्गदूत को 185,000 अश्शूरियों को मृत्यु देते हुए वर्णित किया गया है, जिन्होंने इस्राएल के ऊपर आक्रमण किया था। कुछ लोग निर्गमन अध्याय 12 को भी इसी रूप में देखते हैं, मिस्र में पहिलौठों की मृत्यु एक स्वर्गदूत के हाथों का कार्य था। जबकि ऐसा होना सम्भव है, तथापि बाइबल कहीं पर पहिलौठों की मृत्यु को किसी स्वर्गदूतों के द्वारा होने का वर्णन नहीं करती है। चाहे कुछ भी घटना क्यों न रही हो, जबकि बाइबल यह वर्णन करती है कि स्वर्गदूत प्रभु परमेश्‍वर के आदेश पर मृत्यु के कारण बने थे, तथापि, पवित्र शास्त्र कहीं पर यह शिक्षा नहीं देता है कि मृत्यु के लिए किसी एक स्वर्गदूत को ठहराया गया है।

परमेश्‍वर, और केवल परमेश्‍वर ही, हमारी मृत्यु के समय के ऊपर प्रभुता रखता है। कोई स्वर्गदूत या दुष्टात्मा किसी भी अर्थ में हमारी मृत्यु का कारण परमेश्‍वर द्वारा इच्छित किए हुए समय से पहले प्रगट होने का कारण नहीं बन सकता है। रोमियों 6:23 और प्रकाशितवाक्य 20:11-15 के अनुसार, मृत्यु अलग होना है, अर्थात् हमारे शरीर का हमारे आत्मा-प्राण से अलग होना है (यह शारीरिक मृत्यु है) और, अविश्‍वासियों की घटना में, यह परमेश्‍वर से सदैव के लिए अलग होना है (अर्थात् यह शाश्‍वतकालीन मृत्यु है)। मृत्यु एक ऐसी घटना है, जो घटित होती है। मृत्यु एक स्वर्गदूत, एक दुष्टात्मा, एक व्यक्ति, या कोई एक प्राणी नहीं है। स्वर्गदूत मृत्यु का कारण हो सकते हैं, और हो सकता है कि हमारी मृत्यु के पश्चात् घटित होने वाली बातों में सम्मिलित भी हों — परन्तु तौभी "मृत्यु के स्वर्गदूत" के होने जैसे कोई बात नहीं है।

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