पौलुस के शरीर का काँटा क्या था?



प्रश्न: पौलुस के शरीर का काँटा क्या था?

उत्तर:
पौलुस के शरीर में चुभाए गए काँटे के सम्बन्ध में असँख्य स्पष्टीकरणों को प्रस्तुत किया गया है। उनकी सँख्या प्रलोभन, पीछा करते हुए विरोधियों, पुरानी विकृतियों (जैसे कि आँखों की समस्याएँ, मलेरिया, माइग्रेन रोग से होने वाला सिर दर्द, और मिर्गी इत्यादि) से आगे बढ़ती हुई बोलने की विकलांगता अर्थात् हकलेपन तक पाई जाती हैं। कोई भी इस बात को लेकर सुनिश्चित नहीं कि पौलुस के शरीर का काँटा क्या था, परन्तु कदाचित् यह कोई शारीरिक पीड़ा थी।

हम पौलुस के शरीर में चुभाए हुए इस काँटे के बारे में क्या जानते हैं, जो बात 2 कुरिन्थियों 12:7 में स्वयं उसकी ओर से आती है: “इसलिये मैं प्रकाशनों की बहुतायत से फूल न जाऊँ, मेरे शरीर में एक काँटा चुभाया गया अर्थात् शैतान का एक दूत कि मुझे घूँसे मारे ताकि मैं फूल न जाऊँ।" प्रथम, शरीर में चुभाए हुए काँटे का उद्देश्य पौलुस को नम्र बनाए रखने के लिए था। प्रत्येक वह व्यक्ति जिसका सामना यीशु के साथ हुआ है और जिससे उसने वार्तालाप किया है और जिसे उसने नियुक्त किया है (प्रेरितों के काम 9:2-8) वह अपनी स्वाभाविक अवस्था में, "घमण्डी" बन जाता है। इस सच्चाई के साथ इस बात को जोड़ दें कि नए नियम का अधिकांश भाग उसी के द्वारा पवित्र आत्मा की प्रेरणा से लिखा गया था, और इसलिये यह देखना बहुत ही आसान था, कि पौलुस कैसे अभिमानी (अंग्रेजी का के जी वी अनुवाद) या "सीमा से परे महिमा को प्राप्त करना" (अंग्रेजी का एन के जी वी अनुवाद) या "बहुत अधिक घमण्डी" (अंग्रेजी का एन सी वी अनुवाद) हो जाना हो सकता था। दूसरा, हम जानते हैं, कि ये पीड़ा एक शैतान के एक दूत की ओर से या के द्वारा आई थी। ठीक वैसे ही जैसे परमेश्‍वर ने शैतान को अय्यूब की परीक्षा लेने के लिए अनुमति दी थी (अय्यूब 1:1-12), परमेश्‍वर ने शैतान को पौलुस को परेशान करने के लिए अपने स्वयं के भले उद्देश्य और उसे सदैव परमेश्‍वर की सिद्ध इच्छा के भीतर रहने के लिए अनुमति प्रदान की।

यह बात समझ योग्य है, कि पौलुस इस काँटे को प्रभावशाली और विस्तारित सेवकाई में रूकावट के रूप में समझता था (गलातियों 5:14-16) और यह कि उसने इसे हटाने के लिए परमेश्‍वर से तीन बार प्रार्थना की थी (2 कुरिन्थियों 12:8)। परन्तु परमेश्‍वर ने अपने अनुभव से उस शिक्षा को प्राप्त कर लिया था, जो उसकी लेखनकार्यों में बहुतायत के साथ पाई जाती है: परमेश्‍वर की असीम सामर्थ्य का सर्वोत्तम प्रदर्शन मानवीय कमजोरियों की पृष्ठभूमि में प्रगट होता है (2 कुरिन्थियों 4:7) ताकि एकमात्र परमेश्‍वर को ही महिमा प्राप्त हो (2 कुरिन्थियों 10:17)। इस समस्या को हटाने की अपेक्षा, परमेश्‍वर ने उसे इसमें खड़े रहने के लिए अनुग्रह और सामर्थ्य प्रदान की थी, और परमेश्‍वर ने इस अनुग्रह को उसके लिए पर्याप्त होने की घोषणा की।



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