पर्यायवाद/रूपत्रयवादी पर्यायवाद क्या है?


प्रश्न: पर्यायवाद/रूपत्रयवादी पर्यायवाद क्या है?

उत्तर:
मॉडलिज्म अर्थात् पर्यायवाद और मोनार्कियानिज़्म मॉडलिस्म अर्थात् रूपत्रयवादी पर्यायवाद परमेश्वर और यीशु मसीह के स्वभाव के दो झूठे दृष्टिकोण हैं, जो दूसरी और तीसरी शताब्दी ईस्वी में प्रगट हुए थे। एक पर्यायवाद परमेश्वर को तीन व्यक्तियों की अपेक्षा एक व्यक्ति के रूप में देखता है और मानता है कि पिता, पुत्र और आत्मा एक ही ईश्वरीय व्यक्ति के अलग-अलग तरीके या रूप हैं। पर्यायवाद के अनुसार, परमेश्वर तीन भिन्न अभिव्यक्तियों में परिवर्तित हो सकता है। एक रूपत्रयवाद पर्यायवादी परमेश्वर की एकता में विश्वास (लैटिन शब्द मोनार्किया का अर्थ "एक नियम" से है) इस बिन्दु तक करता है कि वह परमेश्वर की त्रिएक स्वभाव का इनकार करता है। पर्यायवाद और रूपत्रयवादी पर्यायवाद दोनों ही अनिवार्य रूप से पितृसत्तावाद के सिद्धान्त को मानते हैं, यह शिक्षा कि पिता परमेश्वर ने पुत्र के साथ क्रूस के ऊपर (या पुत्र के रूप में) दुख को उठाया, और वे बड़ी घनिष्ठता के साथ सेबेल्युसवाद से सम्बन्धित हैं।

रूपत्रयवादी पर्यायवाद ने दो प्राथमिक रूप गतिशीलतावादी (या अभिग्रहणवादी) पर्यायवाद और रूपत्रयवादी पर्यायवाद को निर्मित किया। गतिशीलतावादी रूपत्रयवादी पर्यायवाद ने यीशु के स्वभाव के बारे में एक गलत दृष्टिकोण के साथ आरम्भ किया, विशेष रूप से यह कहते हुए कि वह परमेश्वर नहीं था, परन्तु अपने बपतिस्मा के समय, परमेश्वर के द्वारा आश्चर्यकर्मों को करने के लिए सामर्थी किया गया था। दूसरी ओर, रूपत्रयवादी पर्यायवाद ने इस दृष्टिकोण को अपनाया कि यीशु परमेश्वर था, परन्तु केवल इस सत्य के आधार पर ही कि यीशु परमेश्वर की "अभिव्यक्तियों" में से एक था। रूपत्रयवादी पर्यायवाद के अनुसार, स्वयं परमेश्वर के लोगोस में कोई भिन्न, व्यक्तिगत अस्तित्व नहीं पाया जाता है। रूपत्रयवादी पर्यायवाद के अनुसार बाइबल के शब्द पिता, पुत्र और आत्मा एक ही व्यक्ति के भिन्न नाम हैं।

रूपत्रयवादी पर्यायवाद यह शिक्षा देता है कि परमेश्वर की एकता परमेश्वरत्व के भीतर पाए जाने वाले व्यक्तियों की भिन्नता के अनुरूप नहीं है। रूपत्रयवादी के अनुसार, परमेश्वर ने स्वयं को पिता के रूप में (मुख्य रूप से पुराने नियम में), पुत्र के रूप में (मुख्य रूप से यीशु के गर्भ में आने से लेकर उसके स्वर्गारोहण तक), और पवित्र आत्मा के रूप में (मुख्य रूप से स्वर्ग में यीशु के स्वर्गारोहण के बाद) प्रकट किया है। रूपत्रयवादी पर्यायवाद की नींव 1901 के आस पास स्मुरना के नोईतुस के झूठे उपदेशों में पाई जाती हैं। नोईतुस ने स्वयं को मूसा कहा और अपने भाई को हारून को बुलाया, और उसने सिखाया कि यदि यीशु परमेश्वर था, तो उसे पिता के समान होना चाहिए था। रोम के हिप्पोलितुस ने अपनी पुस्तक "नोईतुस के विरूद्ध लेख" में इस झूठ का विरोध किया है। रूपत्रयवादी पर्यायवाद के एक आरम्भिक रूप की शिक्षा एशिया माइनर के एक पुरोहित के द्वारा दी गई थी, जो कि प्रिक्सीऊस नामक स्थान में एक पुरोहित के रूप में लगभग 206 ईस्वी सन् में कार्यरत् था, जिसने रोम और कार्थेज की यात्रा की थी। तरतुलीयन ने प्रिक्सीऊस के शिक्षा का विरोध "प्रिक्सीऊस के विरूद्ध" नामक पुस्तक में 213 ईस्वी सन् के आसपास किया है। रूपत्रयवादी पर्यायवाद और उससे सम्बन्धित झूठे शिक्षकों का खण्डन मूल रूप से ओरेगन, सिकन्दरीया के डायोनिसियस और 325 में नीकिया की परिषद के द्वारा किया गया था।

रूपत्रयवादी पर्यायवाद का एक रूप आज भी एकता आधारित पेंटीकोस्टलवाद के रूप में अस्तित्व में पाया जाता है। एकता आधारित धर्मविज्ञान में, जो कि त्रिएकत्व-विरोधी है, परमेश्वरत्व के व्यक्तियों के बीच में कोई अन्तर नहीं है। यीशु परमेश्वर है, परन्तु वह पिता और आत्मा भी है। प्राचीन पर्यायवाद से थोड़े से ही विचलन में रहते हुए, एकता आधारित पेन्टीकोस्टल शिक्षा देता है कि परमेश्वर स्वयं को तीनों "तरीकों" में एक साथ प्रकट करने में सक्षम है, जैसे कि लूका 3:22 में यीशु के बपतिस्मा के समय हुआ था।

बाइबल परमेश्वर को एक परमेश्वर के रूप में प्रस्तुत करती है (व्यवस्थाविवरण 6:4), परन्तु तौभी यह तीन व्यक्तियों में-पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा में होने की बात करती है (मत्ती 28:19)। ये दोनों सत्य किस प्रकार से स्वयं में सामंजस्य करते हैं, यह मानव मन के लिए अकल्पनीय है। जब हम अगम्य को समझने का प्रयास करते हैं, तो हम सदैव विभिन्न स्तरों में असफल रहेंगे। परन्तु पवित्रशास्त्र स्पष्ट करता है कि: परमेश्वर तीन सह-शाश्वत, सह-तुल्य व्यक्तियों के रूप में अस्तित्व में है। यीशु ने अपने पिता (लूका 22:42) से प्रार्थना की और अब स्वर्ग में पिता के दाहिने हाथ पर विराजमान है (इब्रानियों 1:3)। पिता और पुत्र ने आत्मा को संसार में भेजा (यूहन्ना 14:26; 15:26)। पर्यायवाद और अधिक विशेष रूप से रूपत्रयवादी पर्यायवाद धर्मवैज्ञानिक रूप से खतरनाक हैं, क्योंकि ये परमेश्वर के स्वभाव के ऊपर आक्रमण करते हैं। कोई भी शिक्षा जो परमेश्वर को तीन भिन्न व्यक्तियों के रूप में स्वीकार नहीं करती है, बाइबल आधारित नहीं है।

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