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प्रश्न

बाइबल में मत्ती कौन था?

उत्तर


बाइबल में मत्ती यीशु के शिष्यों में से एक था। लूका, यूहन्ना और मरकुस के सुसमाचारों के साथ, मत्ती का सुसमाचार भी प्रेरणा प्रदत्त - और इस तरह यीशु मसीह के जीवन का सटीक और सच्चा इतिहास है। उसका सुसमाचार चारों में सबसे अधिक लम्बा है, और कुछ विद्वानों का मानना है कि यही सबसे पहले लिखा गया था।

मसीह का शिष्य बनने से पहले मत्ती, कफरनहूम नामक नगर में एक चुँगी लेने वाला या कर लेने वाला "प्रतिनिधि" था (मत्ती 9:9; 10:3)। मत्ती को लूका और मरकुस द्वारा हलफई का पुत्र लेवी भी कहा जाता है (मरकुस 2:14; लूका 5:27)। यद्यपि लूका और मरकुस स्पष्ट रूप से नहीं कहते हैं कि, "लेवी और मत्ती एक ही व्यक्ति हैं," हम पृष्ठभूमि के कारण एक ही व्यक्ति के लिए उपयोग किए गए सन्दर्भित नामों से पता लगा सकते हैं। मत्ती की बुलाहट का वृतान्त लूका और मरकुस में लेवी की बुलाहट के वृतान्तों के साथ सटीक रूप से अनुरूप पाया जाता है, इसलिए क्योंकि दोनों भाषा और कालानुक्रमिक रूप से एक ही सन्दर्भ में पाए जाते हैं। साथ ही, परमेश्‍वर के साथ मुलाकात होने के पश्‍चात् किसी व्यक्ति को एक भिन्न नाम का दिया जाना असामान्य नहीं है। अब्राम अब्राहम में परिवर्तित हो गया था, याकूब इस्राएल में परिवर्तित हो गया था, शमौन पतरस में परिवर्तित हो गया था और शाऊल पौलुस में परिवर्तित हो गया था। यह सम्भावना अधिक है कि मत्ती (अर्थात् "परमेश्‍वर का उपहार") वह नाम था, जिसे यीशु ने लेवी को उसके मन परिवर्तन के पश्‍चात् दिया था।

कर संग्रहकर्ताओं को स्वयं उनकी संस्कृति में घृणा की जाती थी क्योंकि वे रोमी सरकार के लिए कार्य किया करते थे और अपनी जाति के लोगों से करों को इकट्ठा करके स्वयं को समृद्ध किया करते थे – और ऐसा वे अक्सर बेईमानी से अत्यधिक मात्रा में इकट्ठा करते हुए करते थे (लूका 19:8 को देखें)। यह सम्भावना अधिक है कि मत्ती समृद्ध व्यक्ति था, क्योंकि लूका का कहना है कि लेवी ने "अपने घर में" एक बड़ी भीड़ के लिए "एक बड़ा भोज दिया" यीशु के साथ आने वालों के लिए दिया था (लूका 5:29)।

मत्ती जैसे चुँगी लेने वालों को धार्मिक कुलीन वर्ग के लोगों के द्वारा बड़े पापियों के रूप में देखा जाता था, इतने बड़े पापी के रूप में कि उनके साथ समय बिताना भी एक अच्छे व्यक्ति की प्रतिष्ठा को तुरन्त धूमिल कर सकता था (मत्ती 9:10–11)। जब यीशु मत्ती के घर पर, कई अन्य कर संग्रहकर्ताओं और पापियों के साथ रात का भोजन कर रहा था, तब फरीसियों ने शिष्यों से यीशु के साथियों की पसन्द के बारे में प्रश्‍न किया। यीशु की प्रतिक्रिया परमेश्‍वर के हृदय और मनुष्य के लिए उसके सुसमाचार की स्पष्ट व्याख्याओं में से एक है: “वैद्य भले चंगों के लिए नहीं परन्तु बीमारों के लिए आवश्यक है... मैं धर्मियों को नहीं, परन्तु पापियों को बुलाने आया हूँ” (मत्ती 9:12-13)। यीशु “भले”, अर्थात् स्वयं को धर्मी मानने वाले लोगों को बचाने के लिए नहीं आया था, परन्तु जो लोग जानते थे कि वे अच्छे नहीं थे - ऐसे लोग को स्वतंत्रता के साथ स्वीकार किया जाता है, क्योंकि उन्हें उद्धार की आवश्यकता होती है (मत्ती 5:3 के साथ तुलना करें)।

ऐसे व्यक्ति को बचाना असम्भव है, जो बचाए नहीं जाने की आवश्यकता का दावा करता है। यीशु के बहुत से अनुयायी निर्धन, अस्वीकृत, बीमार, पापी, थके हुओं में से थे (मत्ती 11:28)। उसने कभी उन लोगों की निन्दा नहीं की; उसने उन्हें क्षमा कर दिया और उन्हें प्रोत्साहित किया। यीशु के प्रति कठोर निन्दा करने वाले फरीसियों, व्यवस्था के शिक्षकों, और धर्मशास्त्रियों ने अपने चारों ओर रहने वाले "कर संग्रहकर्ताओं और पापियों" से स्वयं को उत्तम, योग्य और अच्छा समझा था (मत्ती 9:10; 23:13–15)।

मत्ती उन कर संग्रहकर्तामों में से एक था, जिन्हें यीशु ने बचाया था। यीशु के द्वारा बुलाए जाने पर, मत्ती ने तुरन्त अपने कर संग्रह इकट्ठा करने वाली चौकी को छोड़ दिया और प्रभु के पीछे हो लिया (मत्ती 9:9)। उसने अपने धन के स्रोत को अपने पीछे छोड़ दिया; उसने यीशु के साथ यात्रा करने, कठिनाइयों को पाने और अन्तत: शहीद होने के लिए सुरक्षा और सांत्वना देने वाली अपनी पदवी को अपने पीछे छोड़ दिया; उसने अपने पुराने जीवन को यीशु के साथ एक नए जीवन को यापन करने के लिए अपने पीछे छोड़ दिया।

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