पापियों के साथ यीशु के द्वारा भोजन करने का क्या महत्व है?


प्रश्न: पापियों के साथ यीशु के द्वारा भोजन करने का क्या महत्व है?

उत्तर:
मत्ती को अपने पीछे आने के लिए कहने के तुरन्त बाद, यीशु ने मत्ती के घर में "बहुत से चुंगी लेनेवाले और पापियों" के साथ भोजन किया (मरकुस 2:15)। मत्ती एक चुंगी लेने वाला था, और ये "पापी" उसके मित्र और परिचित थे, जो अब यीशु के साथ समय बिता रहे थे। मत्ती अपनी सामाजिक क्षेत्र के लोगों को यीशु से मिलवाना चाहता था। शास्त्रियों और फरीसियों ने, जो चुंगी लेने वालों को तिरस्कृत समझते थे, शिकायत की, परन्तु पापियों के साथ समय बिताने के प्रति यीशु के कार्य उसकी सेवकाई के उद्देश्य खोए हुओं को ढूंढ़ने और बचाने के अनुरूप थे (लूका 19:10)।

यीशु के दिन में, रब्बी और अन्य आत्मिक अगुवों ने व्यापक सम्मान के सुख को प्राप्त किया था और उनका यहूदी समाज में उच्च सम्मान था। लगभग हर कोई फरीसियों की ओर दिशा निर्देश के लिए देखता था। वे व्यवस्था का कठोरता से पालन करने वाले अनुयायी थे, वे परम्परा के संरक्षक थे, और वे धर्मनिष्ठा के उदाहरण थे। अपने उच्च पदों के कारण, वे उन लोगों से बचते थे, जिन्हें वे "पापी" समझते थे — जो उनकी नियम पद्धति का पालन नहीं करते थे। फरीसी और यीशु के समय के दूसरे धार्मिक वर्ग के लोग निश्चित रूप से चुंगी लेने वालों के साथ किसी तरह को सामाजिक व्यवहार नहीं रखते थे, जो धोखाघड़ी और घृणा किए जाने वाले रोमियों के साथ अपने सहयोग के लिए बदनाम थे।

यीशु ने पापियों के साथ भोजन करना चुना क्योंकि उन्हें यह जानना आवश्यक था कि पश्चाताप और क्षमा उपलब्ध थी। जैसे-जैसे यीशु की सेवकाई बढ़ती चली गई, वैसे-वैसे समाज के सामाजिक रूप से बहिष्कृत लोगों के मध्य में उसकी लोकप्रियता बढ़ती चली गई। जब मत्ती उसके घनिष्ट मित्रों के समूह का भाग था, तब यीशु का स्वाभाविक रूप से उसके समाज के लोगों के साथ अधिक सम्पर्क था। चुंगी लेने वालों और पापियों के साथ समय बिताना इसलिए स्वाभाविक था, क्योंकि यीशु "धर्मियों को नहीं, परन्तु पापियों को बुलाने आया हूँ" (मरकुस 2:17)। यदि यीशु को खोए हुए तक पहुँचना था, तो उनके साथ कुछ सम्पर्क तो होना ही चाहिए। वह उस स्थान पर गया जहाँ आवश्यकता थी क्योंकि "वैद्य भले चंगों के लिये नहीं, परन्तु बीमारों के लिये आवश्यक है" (लूका 5:31)।

मत्ती के साथ भोजन की दावत पर बैठे, यीशु ने सामाजिक प्रतिबन्धों को तोड़ दिया और धर्मी बनाने वाली फरीसियों की कानूनी पद्धति की निन्दा की। सच्चाई तो यह है कि यीशु ने पापियों के साथ भोजन किया, जो यह दर्शाता है कि उसने संस्कृति से परे हटकर लोगों के मनों को देखा। जहाँ फरीसियों ने अपने व्यवहार के कारण लोगों की अवहेलना की, वहीं यीशु ने उनकी आत्मिक आवश्यकता को देखा।

यीशु की पूरी सेवकाई में, वह उन लोगों तक पहुँचा, जिन्हें उसकी आवश्यकता थी। उसने एक त्यागी हुई सामरी स्त्री के साथ अच्छी तरह से बातचीत की — यहाँ तक कि ऐसा करके उसने अपने शिष्यों को भी आश्चर्यचकित कर दिया (यूहन्ना 4:27)। वह लूका 7 में एक अनैतिक स्त्री को क्षमा प्रदान करता है, वह मरकुस 7 में सुरूफिनीकी जाति की एक स्त्री की सहायता करता है, वह लूका 5 में एक कोढ़ी को छूता है, और वह जक्कई के घर में प्रवेश करता है और लूका 19 में उसके साथ भोजन करता है। बार-बार, यीशु ने अछूतों को छूआ और उसने बहुत अधिक प्रेम किया।

यीशु पापियों को बचाने के लिए आया था। परम्परा, सांस्कृतिक प्रतिबन्ध, और कुछ लोगों का नाक-भौं चढ़ाना तब कोई अर्थ नहीं रखता, जब एक व्यक्ति की आत्मा अनन्त गंतव्य की ओर आ रही होती है। "परमेश्‍वर ने अपने पुत्र को जगत में इसलिये नहीं भेजा कि जगत पर दण्ड की आज्ञा दे, परन्तु इसलिये कि जगत उसके द्वारा उद्धार पाए" (यूहन्ना 3:17)।

यीशु ने व्यक्तिगत् लोगों को देखा, न कि उनकी पदवियों। उसने उन पर दया की और उनके आसपास की आवश्यकताओं को पूरा करने का प्रयास किया। परमेश्वर के वचन को साझा करने के साथ ही, यीशु ने पापियों के साथ भोजन किया और उनके साथ समय व्यतीत किया। यह सब देखकर, इसमें कोई सन्देह नहीं है कि इसने पापियों को प्रेरित किया कि वे उसे उत्तम तरीके से जान सकें। उन्होंने यीशु को एक धर्मी व्यक्ति, परमेश्वर के जन के रूप में पहचाना — जिन आश्चर्यकर्मों को उसने प्रगट किया उन्होंने उसकी गवाही दी — और उन्होंने उसकी करुणा और ईमानदारी को देखा।

यीशु ने सामाजिक स्थिति या सांस्कृतिक मापदण्डों के कारण लोगों के साथ अपने सम्बन्धों को स्थापित करने के लिए निर्धारित नहीं किया। एक अच्छे चरवाहे के रूप में, उसने खोई हुई भेड़ों की वहाँ खोज की जहाँ कहीं वे भटके हुए थे। जब मत्ती ने रात के भोजन की मेजबानी की, तो यीशु ने निमन्त्रण को स्वीकार कर लिया। यह उन लोगों के साथ राज्य के शुभ सन्देश को साझा करने का एक अच्छा अवसर था, जिन्हें सबसे अधिक सुनने की आवश्यकता थी (मत्ती 4:23 को देखें)। उसके कार्यों की आलोचना उसके दिन के स्वयंभू व्यवस्थापकों के द्वारा की गई, परन्तु आलोचना ने उसे निराश नहीं किया।

फरीसियों के विपरीत, यीशु के पास आने से पहले लोगों को बदलने की आवश्यकता नहीं थी। उसने उन्हें खोजा, उनसे वहाँ मिला जहाँ वे थे, और उनकी परिस्थितियों में उनके ऊपर अनुग्रह को बढ़ा दिया। परिवर्तन उन लोगों के लिए आता है, जो मसीह को स्वीकार करते हैं, परन्तु यह भीतर से बाहर की ओर होगा। परमेश्वर की दया पापियों को पश्चाताप की ओर ले जाती है (रोमियों 2:4), और यीशु दया से भरा हुआ था।

यीशु ने हमें दिखाया कि हमें सांस्कृतिक मापदण्डों को निर्धारित नहीं करना चाहिए, जिन्हें हम प्रचारित करते हैं। बीमार को चिकित्सक की आवश्यकता होती है। खोई हुए भेड़ को चरवाहे की आवश्यकता होती है। क्या हम खेत में मजदूरों को भेजने के लिए फसल के परमेश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं (लूका 10:2)? क्या हम स्वयं जाने के लिए तैयार हैं?

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