यीशु किस धर्म का था?


प्रश्न: यीशु किस धर्म का था?

उत्तर:
यीशु ने एक यहूदी परिवार में जन्म लिया था जिन्होंने यहूदी व्यवस्था का पालन किया था (लूका 2:27)। यीशु का वंश इस्राएल के बारह गोत्रों में से एक, यहूदा के गोत्र से है। उसका जन्म यहूदी नगर बेतलहम में हुआ और नासरत में उसका पालन-पोषण हुआ। यीशु पूरी तरह से यहूदी संस्कृति, राष्ट्रीयता और धर्म में डूबा हुआ था।

यीशु ने पहली सदी के यहूदी धर्म का अभ्यास किया। वह "व्यवस्था के अधीन जन्मा था" (गलातियों 4:4) और तोराह अर्थात् पंचग्रन्थ को सीखते हुए और उसके उपदेशों का पालन करते हुए बड़ा हुआ। उसने पूरी तरह से मूसा की व्यवस्था का पालन किया — अर्थात् इसकी सभी आज्ञाओं, अध्यादेशों और पर्वों का (इब्रानियों 4:14–16)। उसने न केवल व्यवस्था का पालन किया; उसने इसे पूरा भी किया और इसकी सभी शर्तों को पूरी घनिष्ठता से पूरा किया (मत्ती 5:17–18; रोमियों 10:4)।

यीशु और उसके शिष्यों ने फसह का पर्व (यूहन्ना 2:13, 23; लूका 22:7-8) और झोपड़ियों का पर्व (यूहन्ना 7:2, 10) को मनाया। उसने यूहन्ना 5:1 में वर्णन एक बिना नाम के यहूदी पर्व का पालन किया। उसने आराधना सभाओं में भाग लिया और आराधनालय में शिक्षा दी (मरकुस 1:21; 3:1; यूहन्ना 6:59; 18:20)। उसने दूसरों को मूसा की व्यवस्था का पालन करने और बलिदान देने का परामर्श दिया (मरकुस 1:44)। उसने व्यवस्था के प्रति सम्मान को बढ़ावा दिया, क्योंकि यह उसके दिन के शास्त्रियों और फरीसियों के द्वारा सिखाई जा रही थी (मत्ती 23:1-2)। उसने तनाख अर्थात् पुराने नियम को अक्सर उद्धृत किया (उदाहरण के लिए, मरकुस 12:28–31; लूका 4:4, 8, 12)। इस सब में, यीशु ने दिखाया कि उसका धर्म यहूदी धर्म था।

जब यीशु ने यहूदियों के एक समूह से बात की, तब उसने उन्हें एक साहसिक चुनौती दी: "तुम में से कौन मुझे पापी ठहराता है?" (यूहन्ना 8:46)। यदि यीशु किसी भी तरह से यहूदी धर्म के धार्मिक रीति से पालन किए जाने से दूर हो जाता, तो उसके शत्रु तुरन्त ही उसकी निन्दा करने का इस अवसर को हथिया लेते। जैसा कि इस घटना में हुआ, यीशु की आदत उसके आलोचकों को चुप कराने की थी (मत्ती 22:46)।

यीशु के पास अपने ही धर्म के अगुवों के लिए कई कठोर शब्द थे। यह स्मरण रखना अति महत्वपूर्ण है कि यीशु के द्वारा की गई फरीसियों की निन्दा, शास्त्रियों और सदूकियाँ की निन्दा (मत्ती 23) व्यवस्था या उसके दिनों के यहूदी धर्म की निन्दा नहीं थी। भ्रष्ट अधिकारियों और स्व-धार्मिकता के पाखण्डियों के प्रति यीशु की निन्दा उसके द्वारा उन लोगों की प्रशंसा के ठीक विपरीत थी, जो परमेश्वर के सामने भक्त थे और ईमानदारी से अपने जीवन को विश्वास के साथ व्यतीत करते थे (लूका 21:1-4 को देखें)। यीशु ने कुछ धार्मिक अगुवों के विरूद्ध बात की, क्योंकि "वे मनुष्यों की विधियों को धर्मोपदेश करके सिखाते" थे (मत्ती 15:9)। दो अवसरों पर, यीशु ने मन्दिर में से चोरी करने वाले, क्रूर पापियों को दूर करते हुए इसे शुद्ध किया (यूहन्ना 2:14–17; मत्ती 21:12–13)। इन कार्यों को यहूदी धर्म को नष्ट करने के लिए नहीं अपितु इसे शुद्ध करने के लिए रूपरेखित किया गया था।

यीशु धर्म का पालन करने वाला एक विश्वासयोग्य यहूदी था जो पूरी तरह से व्यवस्था का पालन करता था। उसकी मृत्यु के साथ ही पुरानी वाचा का अन्त हुआ, जिसे इस्राएल के साथ बाँधा गया था — जिसे मन्दिर के परदे के दो टुकड़े होने के द्वारा दिखाया गया था (मरकुस 15:38) — और नई वाचा की स्थापना की (लूका 22:20)। आरम्भिक कलीसिया यहूदी धर्म और यहूदियों के प्रतिज्ञा किए हुए मसीहवाद में निहित था, और मसीह में सबसे आरम्भिक विश्वासियों में से अधिकांश यहूदी थे। परन्तु जब विश्वासियों ने यीशु को मसीह के रूप में घोषित किया, अविश्वासी यहूदियों ने उन्हें अस्वीकार कर दिया, और उन्हें यहूदी धर्म से पूरी तरह से अलग हो जाने के लिए मजबूर कर दिया गया (प्रेरितों के काम 13:45-47 को देखें)।

यीशु ही वह प्रतिज्ञा किया हुआ मसीह था जिसके आगमन की यहूदी प्रतीक्षा कर रहे थे। उसका जन्म यहूदी धर्म में हुआ, उसने यहूदी धर्म को पूरा किया, और, जब उसके अपनों ने उसे अस्वीकार कर दिया, तो उसने अपना जीवन संसार के पापों के लिए बलिदान के रूप में दिया। उसके लहू ने नई वाचा को प्रमाणित किया, और उसकी मृत्यु के तुरन्त बाद, यहूदी धर्म ने अपना मन्दिर, अपने याजकीयपन और अपने बलिदानों को खो दिया।

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