क्या यीशु एक शान्तिवादी व्यक्ति था?


प्रश्न: क्या यीशु एक शान्तिवादी व्यक्ति था?

उत्तर:
एक शान्तिवादी व्यक्ति वह होता है जो हिंसा का विरोध करता है, विशेष रूप से किसी भी उद्देश्य के लिए किए जाने वाले युद्ध के लिए। एक शान्तिवादी अक्सर विवेक या धार्मिक दृढ़ विश्‍वास के कारणों से किसी भी तरह के हथियार को उठाए जाने से इन्कार कर देता है।

यीशु "शान्ति का राजकुमार" है (यशायाह 9:6) जिसका यह अर्थ है कि वह एक दिन पृथ्वी पर सच्ची और स्थायी शान्ति को लाएगा। और इस संसार में उसका संदेश उल्लेखनीय रूप से अहिंसक था (मत्ती 5:38-44)। परन्तु बाइबल स्पष्ट करती है कि कभी-कभी युद्ध आवश्यक होता है (भजन संहिता 144:1 को देखें)। और, बाइबल में यीशु के द्वारा की हुई कुछ भविष्यद्वाणियों की ओर देखते हुए, उसे एक शान्तिवादी व्यक्ति कहना कठिन है। प्रकाशितवाक्य 19:15, यीशु के विषय में बात करते हुए घोषित करता है कि, "उसके मुँह से एक चोखी तलवार निकलती है। 'वह लोहे का राजदण्ड लिये हुए उन पर राज्य करेगा' और सर्वशक्‍तिमान परमेश्‍वर के भयानक प्रकोप की जलजलाहट की मदिरा के कुण्ड में दाख रौंदेगा।" यीशु के सहस्राब्दी राज्य की स्थापना के समय मसीह की सामर्थ्य के विरुद्ध युद्ध के रूप में हिंसा की आवश्यकता होगी। यीशु का वस्त्र "लहू में छिड़का" हुआ होगा (प्रकाशितवाक्य 19:13)।

रोमी सूबेदार के साथ यीशु के वार्तालाप में, यीशु ने सैनिक से प्रशंसा को प्राप्त किया, उसके नौकर को ठीक कर दिया, और उसके विश्‍वास के लिए उसकी सराहना की (मत्ती 8:5-13)। यीशु ने जो नहीं किया वह यह था कि उसने रोमी सैनिक को सेना को छोड़ने के लिए नहीं कहा — इसका सबसे सरल कारण यही है कि यीशु शान्तिवाद का प्रचार नहीं कर रहा था। यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले ने भी सैनिकों का सामना किया, और उन्होंने उससे पूछा था कि, "हम क्या करें?" (लूका 3:14)। यूहन्ना के लिए उन्हें अपने हथियार को छोड़ देने के लिए यही उत्तम अवसर था। परन्तु उसने ऐसा नहीं किया। इसकी अपेक्षा, यूहन्ना ने सैनिकों से कहा, "किसी पर उपद्रव न करना और न झूठा दोष लगाना -- और अपने वेतन पर सन्तोष करना।"

यीशु के शिष्य हथियारों के मालिक थे, जो इस विचार में संघर्ष को उत्पन्न करता है कि यीशु एक शान्तिवादी व्यक्ति था। जिस रात यीशु को धोखा दिया गया था, उसने अपने अनुयायियों को तलवारों को लाने के लिए भी कहा था। उनके पास दो थीं, जिनके लिए यीशु ने दावा किया था वे पर्याप्त थीं (लूका 22:37-39)। जैसे ही यीशु को गिरफ्तार किया जा रहा था, पतरस ने अपनी तलवार खींचीं और उपस्थित लोगों में से एक को मारते हुए घायल कर दिया (यूहन्ना 18:10)। यीशु ने उस व्यक्ति को चंगा कर दिया (लूका 22:51) और पतरस को अपने हथियार को दूर रखने का आदेश दिया (यूहन्ना 18:11)। ध्यान देने वाला तथ्य यह है कि यीशु ने पतरस की निन्दा नहीं की कि उसके पास तलवार थी, अपितु केवल उसका विशेष रूप दुरुपयोग होने की लिए निन्दा की।

सभोपदेशक की पुस्तक विरोधाभासी गतिविधियों के जीवन के सन्तुलन को प्रस्तुत करती है: "हर एक बात का एक अवसर और प्रत्येक काम का, जो आकाश के नीचे, सूरज के नीचे होता है, एक समय है:...और चंगा करने का भी समय; ढा देने का समय, और बनाने का भी समय है,... प्रेम करने का समय, और बैर करने का भी समय; लड़ाई का समय, और मेल का भी समय है" (सभोपदेशक 3:1, 3, और 8)। ये एक शान्तिवादी के शब्द नहीं हो सकते हैं।

जब यीशु ने यह कहा तो वह एक शान्तिवादी की तरह नहीं प्रतीत हो रहा था, "यह न समझो कि मैं पृथ्वी पर मिलाप कराने आया हूँ; मैं मिलाप कराने नहीं, पर तलवार चलवाने आया हूँ। मैं तो आया हूँ कि : 'मनुष्य को उसके पिता से, और बेटी को उसकी माँ से, और बहू को उसकी सास से अलग कर दूँ; मनुष्य के बैरी उसके घर ही के लोग होंगे।'" (मत्ती 10:34-36)। जबकि यीशु युद्ध को निर्धारित नहीं कर रहा है, वह निश्‍चित रूप से उस संघर्ष को अवश्य अपनाता है, जो सच्चाई के ऊपर आक्रमण करने के साथ आता है।

इस शब्द की सामान्य समझ में हमें कभी भी तरह से शान्तिवादी होने के लिए आदेश नहीं दिया गया है। इसकी अपेक्षा, हम बुराई से घृणा करने और भलाई में लगे रहना हैं (रोमियों 12:9)। ऐसा करने के लिए हमें इस संसार की बुराई के विरुद्ध खड़ा होना (जिसके लिए संघर्ष की आवश्यकता है) और धार्मिकता की खोज करनी चाहिए (2 तीमुथियुस 2:22)। यीशु ने इस लक्ष्य का अनुसरण किया और कभी भी पिता की प्रभुता सम्पन्नता योजना के भाग में संघर्ष से पीछे नहीं हटे थे। यीशु ने अपने समय के धार्मिक और राजनीतिक शासकों के विरुद्ध सार्वजनिक रूप से बात की क्योंकि वे परमेश्‍वर की धार्मिकता की खोज नहीं कर रहे थे (लूका 13:31-32; 1 9:45-47)।

जब बुराई को पराजित करने की बात आती है, तो परमेश्‍वर शान्तिवादी नहीं है। पुराना नियम इसके उदाहरणों से भरा है कि कैसे परमेश्‍वर ने युद्ध में उसके लोगों का उपयोग उन जातियों के विरुद्ध किया जिनके पापों का घड़ा भर गया था। निम्न वचनों में कुछ उदाहरण पाए जाते हैं: उत्पत्ति 15:16; गिनती 21:3; 31:1-7; 32:20-21; व्यवस्थाविवरण 7:1-2; यहोशू 6:20-21; 8:1-8; 10:29-32; 11:7-20 इत्यादि। यरीहो की लड़ाई से पहले, यहोशू को "परमेश्‍वर की सेना के सेनापति" से मिलता है (यहोशू 5:14)। इस श्रेष्ठ पुरुष को मसीह के पूर्व-देहधारण के अवस्था की होने की सबसे अधिक सम्भावना है, को "हाथ में नंगी तलवार" (पद 13) लिए हुए प्रतिष्ठित किया गया था। प्रभु युद्ध लड़ने के लिए तैयार था।

हम आश्‍वास्त हो सकते हैं कि यह सदैव धार्मिकता के साथ होता है कि परमेश्‍वर न्याय करता है और युद्ध करता है (प्रकाशितवाक्य 19:11)। "क्योंकि हम उसे जानते हैं, जिसने कहा, 'पलटा लेना मेरा काम है, मैं ही बदला दूँगा,' और फिर यह, कि 'प्रभु अपने लोगों का न्याय करेगा।' जीवते परमेश्‍वर के हाथों में पड़ना भयानक बात है" (इब्रानियों 10:30-31)। हम इन और बाइबल के अन्य सन्दर्भों से यह शिक्षा पाते हैं कि हम केवल उस समय युद्ध में भाग लेना चाहिए जब यह न्यायसंगत हो। आक्रामकता, अन्याय, या नरसंहार का सामना करना युद्ध को न्यायसंगत ठहराता है, और हम मानते हैं कि यीशु के अनुयायी सशस्त्र बलों में सम्मिलित होने और युद्ध में भाग लेने के लिए स्वतंत्र हैं।

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