यीशु क्रूस के ऊपर कितने समय तक रहा?


प्रश्न: यीशु क्रूस के ऊपर कितने समय तक रहा?

उत्तर:
यीशु लगभग छह घण्टे तक क्रूस के ऊपर रहा। "इसी रीति से प्रधान याजक भी शास्त्रियों और पुरनियों समेत ठट्ठा कर करके कहते थे, 'इसने औरों को बचाया, और अपने आप को नहीं बचा सकता।' यह तो 'इस्राएल का राजा' है। अब क्रूस पर से उतर आए तो हम उस पर विश्‍वास करें। उसने परमेश्‍वर पर भरोसा रखा है; यदि वह इस को चाहता है, तो अब इसे छुड़ा ले, क्योंकि इसने कहा था, 'मैं परमेश्‍वर का पुत्र हूँ'"" (मत्ती 27:41-43)। क्रूसीकरण एक ऐसी विधि थी, जिसे प्राचीन रोमी साम्राज्य ने मृत्युदण्ड पाने वालों के लिए उपयोग किया था। क्रूसीकरण सामान्य रूप में गुलामों, विदेशियों, विद्रोहियों, और सबसे अधिक बुरे अपराधों वालों के लिए आरक्षित था।

सभी यहूदी धर्मतन्त्रवादियों ने यीशु को खत्म करने और अपनी सामर्थ्य को बनाए रखने के लिए, रोमी अधिकारियों को यह समझाने के लिए षडयन्त्र के अधीन एक योजना तैयार की कि यीशु को मार दिया जाना चाहिए (मरकुस 14:1; की तुलना यूहन्ना 19:12, 15 से करें)। यहूदी अगुवों ने मसीह के ऊपर विद्रोह को उत्साहित करने और स्वयं को राजा घोषित करने का आरोप लगाया। विद्रोह के आरोप के कारण ही यीशु मृत्युदण्ड की प्राचीन यहूदी पद्धति पत्थरवाह के स्थान पर रोमी क्रूस के ऊपर मृत्युदण्ड को पाने के योग्य हुआ।

क्रूसीकरण को न केवल मृत्युदण्ड देने के लिए अपितु दूसरों को आपराधिक गतिविधियों से दूर रखने के लिए भी रूपरेखित किया गया था। क्रूस पर चढ़ाए जाने के कारण पीड़ितों को अपमानित होना पड़ता था, उन्हें अक्सर पूरी तरह से नंगा लटके रहने के लिए छोड़ दिया जाता था। क्रूस में कलंक के भाव थे, और यहूदी व्यवस्था ने कहा था कि यह एक शाप को लाता था (गलातियों 3:13; 5:11)। शब्द अति दुखदाई का शाब्दिक अर्थ "क्रूस के कारण बाहर निकलते हुए" होने से है; क्रूस पर चढ़ाया जाना मृत्यु के लिए एक "अति दुखदायी" तरीका था क्योंकि यह मृत्यु के लिए बहुत ही धीमा और पीड़ादायी साधन था। परिस्थिति के आधार पर, कुछ लोग क्रूस पर कीलों से ठोक दिए जाने के बाद भी कैद में कुछ दिनों तक रह सकते थे।

इस प्रश्न का उत्तर देना कि यीशु कितने समय तक क्रूस पर लटका रहा था, अपनी सच्चाई में जटिल है क्योंकि सुसमाचारों ने समय को चिह्नित करने के लिए दो पद्धतियों का उपयोग किया है। मत्ती, मरकुस और लूका समय को चिह्नित करने की यहूदी पद्धति का उपयोग करते हैं। यूहन्ना रोमियों की पद्धति का उपयोग करता है। यहूदी पद्धति का उपयोग करते हुए, मरकुस कहता है कि, "तब उन्होंने उसको क्रूस पर चढ़ाया और उसके कपड़ों पर चिट्ठियाँ डालकर, कि किस को क्या मिले, उन्हें बाँट लिया। और एक पहर दिन चढ़ आया था, जब उन्होंने उसको क्रूस पर चढ़ाया" (मरकुस 15:24-25)। इसके अनुसार, मसीह का क्रूस पर चढ़ाया जाना सुबह 9:00 बजे आरम्भ हुआ।

इसके अतिरिक्त समय की यहूदी पद्धति का उपयोग करते हुए, मत्ती का कहना है कि "दोपहर से लेकर तीसरे पहर तक उस सारे देश में अन्धेरा छाया रहा" (मत्ती 27:45)। अर्थात्, अन्धेरा दोपहर 12:00 बजे से अपराह्न 3:00 बजे तक रहा। यह क्रूस के ऊपर यीशु के अन्तिम तीन घण्टे थे। समय के अन्त में, "तब यीशु ने फिर बड़े शब्द से चिल्‍लाकर प्राण छोड़ दिए" (मत्ती 27:50)। उसके बाद एक रोमन सैनिक ने उसकी मृत्यु के बारे में सुनिश्चित किया (यूहन्ना 19:34), और यीशु के शरीर को नीचे उतार लिया गया। यीशु लगभग सुबह 9:00 बजे से लेकर 3:00 बजे तक, कुल छह घण्टे क्रूस के ऊपर रहा।

यूहन्ना विवरण को जोड़ता है कि यीशु की जाँच पुन्तियुस पिलातुस के सामने हो रही थी, रोमी समय के अनुसार यह "छठे घण्टे के लगभग था" (यूहन्ना 19:14)। चूंकि रोमी आधी रात से अपनी समय की घड़ी को गिनना आरम्भ करते थे, इसलिए "छठा घण्टा" अर्थात् सुबह 6:00 बजे आरम्भ हुआ होगा।
इस तरह, रोमी पद्धति का उपयोग करके हम यह पाते हैं कि:
"छठे घंटे के लगभग" = लगभग सुबह 6:00 बजे यीशु को पिलातुस के द्वारा मृत्यु दण्ड सुनाया गया।
इसके बाद, यहूदी पद्धति का उपयोग करके हम यह पाते हैं कि:
"तीसरा घण्टा" = सुबह 9:00 बजे आरम्भ होता है। यह क्रूसीकरण का समय है।
"छठा घण्टा" = दोपहर 12:00 बजे (मध्याह्न)। अन्धेरा छाने लगता है।
"नौवां घण्टा" = अपराह्न 3:00 बजे यीशु मर जाता है।
इन सबको मिलाकर, यीशु की जाँच सुबह लगभग 6:00 बजे समाप्त हुई थी। उसका क्रूस पर चढ़ाया जाना लगभग तीन घण्टे बाद आरम्भ हुआ, और लगभग छह घण्टे के बाद उसकी मृत्यु हो गई।

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