मैं कैसे जान सकता हूँ कि परमेश्‍वर की योजना क्या है?


प्रश्न: मैं कैसे जान सकता हूँ कि परमेश्‍वर की योजना क्या है?

उत्तर:
अधिकांश मसीही विश्‍वासी सचमुच में अपने जीवन के लिए परमेश्‍वर की योजना को समझना चाहते हैं। तौभी कई प्रश्‍न पाए जाते हैं: मैं परमेश्‍वर की योजना कैसे खोजूँ? मैं कैसे आश्‍वस्त हो सकता हूँ? सौभाग्य से, बाइबल परमेश्‍वर की इच्छा के सम्बन्ध में कई महत्वपूर्ण सिद्धान्तों को प्रदान करती है। परमेश्‍वर हमारे जीवन के लिए अपनी इच्छा को छुपाने का प्रयास नहीं कर रहा है; वह चाहता है कि उसकी सन्तान उसकी इच्छा को जान लें और उसका अनुसरण करें।

सबसे पहले, बाइबल परमेश्‍वर की योजना के बारे में स्पष्ट कथनों से भरी हुई है, जो सभी मसीही विश्‍वासियों के ऊपर लागू होते हैं। उदाहरण के लिए, 1 थिस्सलुनीकियों 5:16-18 शिक्षा देता है, "सदा आनन्दित रहो। निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो। हर बात में धन्यवाद करो; क्योंकि तुम्हारे लिये मसीह यीशु में परमेश्‍वर की यही इच्छा है।" ये तीनों गतिविधियाँ — आनन्दित रहना, प्रार्थना करना और धन्यवाद देना – चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी क्यों न हों, तौभी सभी विश्‍वासियों के लिए परमेश्‍वर की इच्छा है।

हम उसके वचन के माध्यम से परमेश्‍वर की इच्छा को समझ सकते हैं। परमेश्‍वर का वचन सिद्ध है, और हम इसके अध्ययन के माध्यम से अपने जीवन के लिए परमेश्‍वर की योजना की खोज कर सकते हैं। दूसरा तीमुथियुस 3:16-17 कहता है, "सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्‍वर की प्रेरणा से रचा गया है और उपदेश, और समझाने, और सुधारने, और धार्मिकता की शिक्षा के लिये लाभदायक है, ताकि परमेश्‍वर का जन सिद्ध बने, और हर एक भले काम के लिये तत्पर हो जाए।"

दूसरा, हम अपने जीवन में घनिष्ठता के साथ उसका अनुसरण करके परमेश्‍वर की योजना को सर्वोत्तम रीति से समझ सकते हैं। रोमियों 12:1-2 की प्रतिज्ञा है कि, "इसलिये हे भाइयो, मैं तुम से परमेश्‍वर की दया स्मरण दिला कर विनती करता हूँ कि अपने शरीरों को जीवित, और पवित्र, और परमेश्‍वर को भावता हुआ बलिदान करके चढ़ाओ — यही तुम्हारी आत्मिक सेवा है। इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारे मन के नए हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए, जिससे तुम परमेश्‍वर की — भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो।" जब हम परमेश्‍वर को अपना जीवन समर्पित करते हैं, और इस संसार के सिद्धान्तों की ओर से मुड़ जाते हैं, तो हम अपने मनों को परमेश्‍वर की ओर से सुनने के लिए तैयार करते हैं (1 पतरस 4:2 को भी देखें)।

पहला थिस्सलुनीकियों 4:3-7 "जीवित बलिदान" होने की आवश्यकता की पुष्टि करता है और परमेश्‍वर की योजना के बारे में अधिक जानकारी देता है: "क्योंकि परमेश्‍वर की इच्छा यह है कि तुम पवित्र बनो : अर्थात् व्यभिचार से बचे रहो, और तुम में से हर एक पवित्रता और आदर के साथ अपनी पत्नी को प्राप्‍त करना जाने, और यह काम अभिलाषा से नहीं, और न उन जातियों के समान जो परमेश्‍वर को नहीं जानतीं, कि इस बात में कोई अपने भाई को न ठगे, और न उस पर दाँव चलाए, क्योंकि प्रभु इन सब बातों का पलटा लेनेवाला है; जैसा कि हम ने पहले ही तुम से कहा और चिताया भी था। क्योंकि परमेश्‍वर ने हमें अशुद्ध होने के लिये नहीं, परन्तु पवित्र होने के लिये बुलाया है।"

तीसरा, हम प्रार्थना के माध्यम से परमेश्‍वर की योजना की खोज कर सकते हैं। कुलुस्सियों 4:12 ध्यान आकर्षित करता है कि इपफ्रास नामक एक मसीही विश्‍वासी "सदा तुम्हारे लिये प्रार्थनाओं में प्रयत्न करता है, ताकि तुम सिद्ध होकर पूर्ण विश्‍वास के साथ परमेश्‍वर की इच्छा पर स्थिर रहो।" कुलुस्सियों के मसीही विश्‍वासियों को परमेश्‍वर की इच्छा को जानने और उसके अनुसार चलने की आवश्यकता थी, और इसलिए इपफ्रास ने उनके लिए प्रार्थना की। हम प्रार्थना के माध्यम से परमेश्‍वर की इच्छा के प्रति अपनी समझ में वृद्धि कर सकते हैं। हम दूसरों के लिए उसकी योजना को प्रकट करने के लिए भी परमेश्‍वर से प्रार्थना कर सकते हैं।

चौथा, परमेश्‍वर कई बार व्यक्तिगत् परिस्थितियों, सम्बन्धों या यहाँ तक कि स्वप्नों सहित कई अन्य तरीकों के द्वारा अपनी योजनाओं को प्रकट करता है या उनकी पुष्टि करता है। यद्यपि, ये क्षेत्र प्रायः अधिक व्यक्तिपरक या आत्मनिष्ठक होते हैं, और पवित्रशास्त्र में हमें स्पष्ट रूप से जो कुछ भी कहा गया है, उसके द्वारा हमें इन संकेतों का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करना चाहिए।

हम परमेश्‍वर की प्रतिज्ञा के प्रति भी आश्‍वस्त रह सकते हैं: "परमेश्‍वर के निकट आओ तो वह भी तुम्हारे निकट आएगा" (याकूब 4:8)। जब हम प्रार्थना करते हैं, जब हम पवित्रशास्त्र का अध्ययन करते हैं, और परमेश्‍वर के सामने पवित्रताई से जीवन व्यतीत करने की खोज करते हैं, तब वह हमारे लिए अपने सिद्ध समय में अपनी योजना को उस तरीके से प्रकट करेगा कि जिसे हम समझ सकते हैं।

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