परमेश्वर हमारा शरणस्थान कैसे है?


प्रश्न: परमेश्वर हमारा शरणस्थान कैसे है?

उत्तर:
शब्द शरणस्थान के बारे में आप क्या सोचता है? हो सकता है कि यह दरवाजों पर लगे हुए ताले के साथ एक भव्य भवन, कदाचित्त् एक मोटी दीवार वाला किला, या कदाचित्त् हो सकता है कि वर्षा के मौसम में आपको सूखा रखने के लिए छतरी जैसा कोई साधारण सा स्थान हो। कोई भी चित्र जो आपके मन में आता है, उस से यह सहमति मिलती है कि एक शरण स्थान सुरक्षित स्थान होता है। जब बाइबल परमेश्वर को हमारे शरणस्थान के रूप में वर्णित करती है, तो यह कहती है कि परमेश्वर हमारी सुरक्षा का स्थान है उस समय जब हमें किसी बात से सुरक्षा की आवश्यकता होती है।

परमेश्वर को अपने शरणस्थान के रूप में जानना हमें अधिक स्वतन्त्र रूप से उसके ऊपर भरोसा करने में सक्षम बनाता है। हमें उन स्थितियों या लोगों से डरने की आवश्यकता नहीं है जो हमारी भलाई के लिए खतरा है, चाहे वे भौतिक या आत्मिक अर्थों में ही क्यों न हों। ऐसी कोई भी स्थिति नहीं है जिसका सामना हम कभी भी परमेश्वर के नियन्त्रण से बाहर करेंगे, इसलिए सदैव सबसे अच्छा स्थान उसके साथ ही है। "यहोवा का नाम दृढ़ गढ़ है, धर्मी उसमें भागकर सब दुर्घटनाओं से बचता है" (नीतिवचन 18:10)।

एक प्रश्न जो उठ खड़ा होता है वह यह है कि "मैं परमेश्वर को कैसे अपना शरणस्थान बनाऊँ?" हमें किसी खतरे से बचने के लिए एक भौतिक शरणस्थान चित्र को बनाना आसान होता है, परन्तु हम परमेश्वर को कैसे — अपना शरणस्थान — बना सकते हैं, जिसे हम नहीं देख सकते हैं?

दाऊद ऐसे व्यक्ति का एक महान उदाहरण है जो परमेश्वर को अपने शरणस्थान के रूप में जानता था। अपने जीवन में विभिन्न पड़ावों पर, दाऊद ऐसे लोगों से भागा जो सचमुच में उसे मारना चाहते थे, परन्तु उसने सदैव परमेश्वर में ही अपनी सुरक्षा को पाया। "मेरे उद्धार और मेरी महिमा का आधार परमेश्‍वर है; मेरी दृढ़ चट्टान, और मेरा शरणस्थान परमेश्‍वर है। हे लोगो, हर समय उस पर भरोसा रखो; उससे अपने अपने मन की बातें खोलकर कहो; परमेश्‍वर हमारा शरणस्थान है" (भजन संहिता 62:7-8)। परमेश्वर को अपना शरणस्थान बनाने का एक आसान तरीका यह है कि हम उसे ऐसा बनने के लिए कहें। दाऊद ने कहा है कि, "उससे अपने अपने मन की बातें खोलकर कहो"; यही तो दाऊद ने प्रत्येक समय किया था। उसने अपने मन को परमेश्वर के सामने उण्डेलते हुए वह सब कुछ बताया जो उसके जीवन में चल रहा था और उसने परमेश्वर को अपनी ओर से हस्तक्षेप करने के लिए कहा। जब हम सहायता या सुरक्षा के लिए परमेश्वर की ओर मुड़ते हैं, तो हम उसे अपने शरणस्थान के रूप में जानने लगते हैं।

दाऊद के विश्वास के विपरीत, यशायाह के दिनों में इस्राएल के अगुवों ने परमेश्वर के अतिरिक्त अन्य चीजों में सुरक्षा को खोजने का प्रयास किया था। यशायाह 28:15 में, प्रभु ने उन्हें "झूठ की शरण लेने और मिथ्या की आड़ में छिपे हुए होने" के लिए ताड़ना दी। परमेश्वर तब उन्हें एक सच्ची शरण प्रदान करता है: "देखो, मैं ने सिय्योन में नींव का एक पत्थर रखा है, एक परखा हुआ पत्थर, कोने का अनमोल और अति दृढ़ नींव के योग्य पत्थर : और जो कोई विश्‍वास रखे वह उतावली न करेगा। और मैं न्याय को डोरी और धर्म को साहुल ठहराऊँगा; और तुम्हारा झूठ का शरणस्थान ओलों से बह जाएगा, और तुम्हारे छिपने का स्थान जल से डूब जाएगा" (यशायाह 28:16–18)। हम परमेश्वर के अतिरिक्त अन्य चीजों में सुरक्षा की खोज कर सकते हैं, परन्तु ऐसी चीजें केवल सुरक्षा की झूठी भावना को ही प्रदान कर सकती हैं। परमेश्वर ही अभी तक पाए जाने वाला एकमात्र वास्तविक शरणस्थान है।

परमेश्वर हमारा शरणस्थान है। यद्यपि, इसका अर्थ यह नहीं है कि वह हमें कभी भी कठिनाई या खतरनाक परिस्थितियों में नहीं ले जाएगा। यीशु ने चेलों को एक नाव में, इस बात को अच्छी तरह से जानते हुए चढ़ाया कि एक तेज तूफान चल रहा था; चेले घबरा गए, परन्तु यीशु, उनके शरणस्थान, ने तूफान को शान्त किया (मत्ती 8:23–27)। जब हम परमेश्वर की इच्छा में होते हैं, तब हम विश्वास के साथ सबसे अधिक खतरनाक परिस्थितियों का भी सामना कर सकते हैं, क्योंकि परमेश्वर हमारे साथ होता है।

असँख्य बार, परमेश्वर ने इस्राएलियों को सेनाओं की तुलना में अधिक शक्तिशाली बना दिया था, क्योंकि जब उन्होंने परमेश्वर पर भरोसा किया और उसकी आज्ञा मानी, तो वे सदैव विजयी रहे (यहोशू अध्याय 6 और 8 को कुछ उदाहरणों के लिए देखें)। यीशु ने हमसे कहा है कि, "मैं ने ये बातें तुम से इसलिये कही हैं कि तुम्हें मुझ में शान्ति मिले। संसार में तुम्हें क्लेश होता है, परन्तु ढाढ़स बाँधो, मैं ने संसार को जीत लिया है" (यूहन्ना 16:33)।

यह बात कोई अर्थ नहीं रखती है कि हमारी परिस्थिति क्या है, सदैव सबसे सुरक्षित स्थान परमेश्वर की इच्छा के केन्द्र में रहना है। वह हमारी शरण बनने की प्रतिज्ञा करता है: "'मैं तुझे कभी न छोड़ूँगा, और न कभी तुझे त्यागूँगा।' इसलिये हम निडर होकर कहते हैं, 'प्रभु मेरा सहायक है, मैं न डरूँगा; मनुष्य मेरा क्या कर सकता है?''' (इब्रानियों 13:5–6)।

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