इसका क्या अर्थ है कि त्रिएक परमेश्वर में तीन व्यक्ति है?


प्रश्न: इसका क्या अर्थ है कि त्रिएक परमेश्वर में तीन व्यक्ति है?

उत्तर:
जब हम पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के बारे में “व्यक्तियों” के रूप में बात करते हैं, तो हमारा अर्थ यह नहीं होता है कि वे मनुष्य हैं या वे किसी भी तरह से मानव जाति की तरह हैं। हमारी प्रतिदिन की भाषा में, यद्यपि, शब्द व्यक्ति का अक्सर उपयोग जिस तरह से किया जाता है, उसके कारण यह समझा जा सकता है कि त्रिएकत्व के तीन “व्यक्तियों” के संदर्भ में कुछ भ्रम पाया जाता है।

जब हम परमेश्वर के बारे में बात करते हैं, तो हम यह दिखाने के लिए शब्द व्यक्ति का उपयोग करते हैं कि पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा प्रत्येक में व्यक्तित्व है या प्रत्येक व्यक्ति है। अर्थात्, पिता, पुत्र, और पवित्र आत्मा प्रत्येक में बुद्धि, भावना और इच्छा है। तर्कसंगतता, भावना और इच्छाशक्ति के साथ कोई भी प्राणी एक व्यक्ति माना जा सकता है; इस प्रकार, मनुष्य व्यक्ति हैं, परन्तु इसी तरह से स्वर्गीय प्राणी और ईश्वरीय प्राणी भी हैं। व्यक्ति की परिभाषा में उस साधारण कारण के लिए भौतिकता सम्मिलित नहीं हो सकती है कि मनुष्य मृत्यु के बाद व्यक्ति बने रहने से नहीं रूकता है। एक मृत व्यक्ति का शरीर नाश होने के लिए छोड़ दिया जाता है, परन्तु उसका सच्चा आत्म — उसका व्यक्तित्व स्वर्ग या नरक में जीवित रहता है।

जब हम तीन व्यक्तियों में विद्यमान परमेश्वर की बात करते हैं, तो हमारा अर्थ यह होता है कि परमेश्वर का अस्तित्व बुद्धि, भावना और इच्छाशक्ति के तीन भिन्न केन्द्रों से युक्त है। त्रिएकत्व के प्रत्येक व्यक्ति की सृष्टि की रचना और मानव जाति के उद्धार में एक अद्वितीय भूमिका है। पवित्र आत्मा अद्वितीय है और पिता या पुत्र नहीं है (वह पिता और पुत्र से निकलता है, यूहन्ना 15:26)। पिता और पुत्र भी अद्वितीय हैं (जब यीशु ने पिता से प्रार्थना की, वह स्वयं से प्रार्थना नहीं कर रहा था, लूका 23:34)। प्रत्येक परमेश्वर है, परन्तु प्रत्येक एक भिन्न “व्यक्ति” है। शब्द व्यक्ति का उपयोग करना एकमात्र ऐसा तरीका है जिसमें मानवीय भाषा में इस अवधारणा का वर्णन किया जा सके।

त्रिएकत्व के सभी तीन व्यक्तियों में सिद्धता के साथ एक एकीकृत परमेश्वर सम्मिलित है। वे एक जैसे स्वभाव और तत्व को साझा करते हैं, और वे सभी एक ही परमेश्वर है, परन्तु त्रिएकत्व का प्रत्येक व्यक्ति भिन्न और अद्वितीय है। यह तथ्य कि परमेश्वर तीन व्यक्तियों में विद्यमान है, कई कारणों से महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए, परमेश्वर प्रेम है (1 यूहन्ना 4:8)। परन्तु, अनादि काल में, इससे पहले कि परमेश्वर ने किसी और की सृष्टि की, क्या वह वास्तव में प्रेम हो सकता था? अर्थात्, क्या प्रेम विद्यमान हो सकता है जहाँ कोई प्रेम करने वाला नहीं है? क्योंकि परमेश्वर तीन सह-समान, सह-अनन्त व्यक्तियों में विद्यमान हैं, प्रेम भी विद्यमान है। शाश्वत प्रेम को परमेश्‍वरत्व के व्यक्तियों के बीच अनन्त रूप से व्यक्त किया गया है। पिता, पुत्र और आत्मा ने सदैव एक-दूसरे से प्रेम किया है, और इसलिए प्रेम शाश्वत है।

एक बार जब हम इस धारणा को छोड़ देते हैं कि एक “व्यक्ति” केवल एक ही “मानवीय व्यक्ति” हो सकता है, तो हम अधिक आसानी से समझते हुए सही रूप में कह सकते हैं कि परमेश्वर कैसे “तीन व्यक्तियों” के अस्तित्व में विद्यमान रह सकता है।

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