परमेश्वर ऐसे लोगों की सृष्टि क्यों करता है जिन्हें वह जानता है कि वे नरक में जाने वाले हैं?


प्रश्न: परमेश्वर ऐसे लोगों की सृष्टि क्यों करता है जिन्हें वह जानता है कि वे नरक में जाने वाले हैं?

उत्तर:
कृपया समझें कि परमेश्वर किसी के लिए भी नरक में जाने का कारण नहीं बनाता है। अपितु, मनुष्य स्वयं आप ही वहाँ जाना चुनता है। आप उन लोगों की प्रगति को देख सकते हैं जो रोमियों की पुस्तक के पहले तीन अध्यायों में मसीह को अस्वीकार करते हैं। परमेश्वर का क्रोध अधर्म के विरुद्ध प्रकट होता है क्योंकि मनुष्य सृष्टिकर्ता को अस्वीकार करता है और सृष्टि की पूजा करता है (रोमियों 1:18–20)। लोग अपनी आँखों में बुद्धिमान होने की प्रशंसा करते हैं (रोमियों 1:22) और सृष्टि की गई चीजों के साथ परमेश्वर की महिमा को बदल देते हैं (रोमियों 1:23-25)। ये लोग तब पाप के एक अधूरे चलते रहने वाले चक्र में बने रहते हैं जो कि रोमियों 1:28–31 में सूचीबद्ध है, ऐसे पाप जिससे हम सभी सम्बन्धित हैं। वे न केवल इन पापों में भाग लेते हैं, अपितु वे उन लोगों के लिए स्वीकृति देते हैं जो उन्हें करते हैं (रोमियों 1:32)। मनुष्यों के पास न केवल परमेश्वर की सामर्थ्य को देखने के लिए संसार की सृष्टि है, अपितु उनके पास उनके पाप के लिए उन्हें दोषी ठहराने के लिए विवेक भी है (रोमियों 2:14–15)। अन्त में, लोगों को बिना किसी बहाने के छोड़ दिया जाता है। हम अपने पापों के कारण मृत्यु के योग्य हैं, और हम परमेश्वर के सामने दोषी खड़े होते हैं।

यीशु मसीह शरीर में आया था ताकि "ये इसलिये लिखे गए हैं कि तुम विश्‍वास करो कि यीशु ही परमेश्‍वर का पुत्र मसीह है, और विश्‍वास करके उसके नाम से जीवन पाओ" (यूहन्ना 20:31)। यह परमेश्वर के अस्तित्व का एक और गवाह है और साथ ही यह उन लोगों को दण्ड दिए जाने के भी खड़ा है जो मसीह को परमेश्वर के पुत्र के रूप में अस्वीकार करना चुनते हैं। क्योंकि मसीह पाप के दण्ड को चुकाने, और पिता को प्रगट करने के लिए आया था (यूहन्ना 1:18), इसलिए लोगों के पास उसे अस्वीकार करने का कोई बहाना नहीं है। लोग नरक में जाना पसन्द करते हैं क्योंकि वे मसीह को अस्वीकार करते हैं, इसलिए नहीं कि परमेश्वर उन्हें वहाँ जाने देने का कारण बनाता है। परमेश्वर ने दण्ड को चुका दिया है, स्वयं को सभी के सामने प्रकट किया है, और अब मनुष्य "बिना किसी बहाने" के हैं (रोमियों 1:20)। परमेश्वर लोगों को विश्वास करने के लिए नया जन्म पाने का अवसर प्रदान करने की अनुमति देता है, परन्तु यह एक व्यक्ति का दायित्व है कि वह इसका चुनाव करे। यदि परमेश्वर लोगों को प्रभु में विश्वास करने का अवसर नहीं देता तो वह कैसा परमेश्वर होगा?

इसे समझ पाना अभी भी एक बहुत ही कठिन धारणा है। हम केवल परमेश्वर के स्वभाव और चरित्र के बारे में जो कुछ जानते हैं, उस पर ही भरोसा कर सकते हैं कि उसकी संप्रभुता और दया एक दूसरे के विपरीत नहीं है, और यह विश्वास करते हैं कि वह जो कुछ भी करता है और/या करने की अनुमति देता है वह अन्ततः उसकी महिमा के लिए ही होगा। हम उसकी आराधना और आज्ञाकारिता में विश्वास करने के लिए स्वयं को समर्पित करते हैं और विश्वास करते हैं कि वह "अपनी इच्छा के मत के अनुसार सब कुछ करता है" (इफिसियों 1:11) और यह कि उसके तरीके सिद्ध हैं, तब भी जब हम उन्हें नहीं समझते हैं। "वह चट्टान है, उसका काम खरा है; और उसकी सारी गति न्याय की है। वह सच्‍चा ईश्‍वर है, उसमें कुटिलता नहीं, वह धर्मी और सीधा है" (व्यवस्थाविवरण 32:4)।

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