इसका क्या अर्थ है कि बाइबल ईश्‍वर-श्‍वसित है?


प्रश्न: इसका क्या अर्थ है कि बाइबल ईश्‍वर-श्‍वसित है?

उत्तर:
2 तीमुथियुस 3:16 में, पौलुस कहता है कि, "सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्‍वर की प्रेरणा से रचा गया है और उपदेश, और समझाने, और सुधारने, और धार्मिकता की शिक्षा के लिये लाभदायक है। यूनानी शब्द थिओफ़िनेटोस की बाइबिल में यही केवल एक बार ही उपयोग हुआ है, जिसका अर्थ ईश्‍वर-श्‍वसित या "परमेश्‍वर की प्रेरणा के कारण, परमेश्‍वर के द्वारा प्रेरित, परमेश्‍वर के द्वारा प्रेरित होने के कारण," परन्तु पवित्रशास्त्र के अन्य सन्दर्भ पवित्रशास्त्र को ईश्‍वर-श्‍वसित अर्थात् परमेश्‍वर के द्वारा प्रेरित होने का मूलभूत रूप से समर्थन करते हैं।

ईश्‍वर-श्‍वसित या परमेश्‍वर की प्रेरणा में परमेश्‍वर के श्‍वास की सामर्थ्य पवित्रशास्त्र में विस्तारित मिलती है। परमेश्‍वर ने आदम की नथनों में "जीवन का श्‍वास" फूँक दिया था (उत्पत्ति 2:7), और यीशु ने "उन पर फूँका और कहा, 'पवित्र आत्मा लो'" (यूहन्ना 20:22)। 2 पतरस 1:21 में हमें बताया गया है कि, "क्योंकि कोई भी भविष्यद्वाणी मनुष्य की इच्छा से कभी नहीं हुई, पर भक्‍त जन पवित्र आत्मा के द्वारा उभारे जाकर परमेश्‍वर की ओर से बोलते थे।" यहाँ हम पवित्रशास्त्र की सच्चाइयों को सीधे परमेश्‍वर की ओर आने के रूप में वर्णित करते हैं, लेखकों की इच्छा से नहीं, वह तो मात्र उन्हें लिपिबद्ध करते थे।

पतरस इस ओर ध्यान आकर्षित करता है कि पौलुस ने लिखा है कि, "उस ज्ञान के अनुसार जो उसे मिला" और यह कि उन सन्देशों के ऊपर ध्यान देने में विफलता पाठकों को खतरे की ओर ले जाती है (2 पतरस 3:15-16)। पवित्रशास्त्र पवित्र आत्मा की ओर से आता है, जिसे हम "मनुष्यों के ज्ञान की सिखाई हुई बातों में नहीं, परन्तु आत्मा की सिखाई हुई बातों में, आत्मिक बातों से मिला मिलाकर" सुनाते हैं (1 कुरिन्थियों 2:13)। वास्तव में, बिरीया के विश्‍वासियों ने पौलुस की विश्‍वसनीयता की जाँच करने के लिए परमेश्‍वर के प्रेरित वचन का निष्ठा से उपयोग किया था: "और प्रतिदिन पवित्रशास्त्रों में ढूँढ़ते रहे कि ये बातें योंही हैं कि नहीं। यह देखने के लिए हर दिन पवित्रशास्त्र की जांच की कि पौलुस ने क्या कहा था" (प्रेरितों के काम 17:11)।

विश्‍वास इस बात को केन्द्रित करता है कि कैसे किसी को परमेश्‍वर के प्रेरित वचन की वैधता या मूल्य प्राप्त होता है। "परन्तु शारीरिक मनुष्य परमेश्‍वर के आत्मा की बातें ग्रहण नहीं करता, क्योंकि वे उसकी दृष्‍टि में मूर्खता की बातें हैं, और न वह उन्हें जान सकता है क्योंकि उनकी जाँच आत्मिक रीति से होती है" (1 कुरिन्थियों 2:14)। "आत्मिक मनुष्य" वह व्यक्ति है जिसे उसकी आत्मा के उद्धार के लिए विश्‍वास का वरदान दिया गया है (इफिसियों 2:8-9)। इब्रानियों 11:1 कहता है कि, "अब विश्‍वास आशा की हुई वस्तुओं का निश्‍चय, और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है। सुसमाचार में परमेश्‍वर द्वारा प्रकट की गई एक धार्मिकता है, परन्तु हमारी धार्मिकता आती है और इसे केवल विश्‍वास के द्वारा ही बनाए रखा जाता है। "धर्मी जन विश्‍वास से ही जीवित रहेगा" (रोमियों 1:17)।

यद्यपि बाइबल में 2 तीमुथियुस 3:16 एकमात्र ऐसा स्थान हो सकता है, जहाँ ईश्‍वर-श्‍वसित या "परमेश्‍वर की प्रेरणा" वाक्यांश का वर्णन परमेश्‍वर के वचन को करने के लिए किया गया है, तथापि पवित्रशास्त्र ऐसे ही दावों से भरा हुआ है। ये वास्तव में परमेश्‍वर के वचन हैं, जो हमें स्मरण दिलाते हैं कि जीवन के सभी पहलुओं में हमें मार्गदर्शन देने के लिए उसकी सच्चाई और प्रेम वहीं से प्राप्त की जा सकती है। प्रेरित याकूब पवित्रशास्त्र के स्वभाव (और कई अन्य बातों) के बारे में बात कर रहा था, जब उसने यह घोषणा की, "क्योंकि हर एक अच्छा वरदान और हर एक उत्तम दान ऊपर ही से है, और ज्योतियों के पिता की ओर से मिलता है, जिसमें न तो कोई परिवर्तन हो सकता है, और न अदल बदल के कारण उस पर छाया पड़ती है" (याकूब 1:17)।

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