परमेश्वर धोखे की अनुमति क्यों देता है?


प्रश्न: परमेश्वर धोखे की अनुमति क्यों देता है?

उत्तर:
परमेश्वर की इच्छा है कि सभी लोग पश्चाताप करें और बचाए जाएँ (2 पतरस 3:9)। ठीक इसी समय, शैतान, "झूठ का पिता" (यूहन्ना 8:44), उन लोगों को धोखा देता है जिन्हें सच्चाई को स्वीकार करने की आवश्यकता होती है। "उन अविश्‍वासियों के लिये, जिन की बुद्धि इस संसार के ईश्‍वर ने अंधी कर दी है, ताकि मसीह जो परमेश्‍वर का प्रतिरूप है, उसके तेजोमय सुसमाचार का प्रकाश उन पर न चमके" (2 कुरिन्थियों 4:4)। निश्चित रूप से, परमेश्वर शैतान के झूठ को रोक सकता है और लोगों को लड़ने का अवसर दे सकता है।

पाप और धोखा कैसे आपस में सम्बन्धित है, इसके लिए बाइबल एक सुसंगत चित्र को प्रस्तुत करती है। जो प्रकाशित होता है वह यह है कि जिस तरह से हम धोखे के बारे में सोचते हैं, वह सही शब्दों में, थोड़ा सा धोखा प्रतीत होता है। आत्मिक रूप से कहना, धोखा देना केवल छल करने या झूठ बोलने से कहीं अधिक गहरा होता है। बचाए जाने के लिए, एक व्यक्ति को किसी विशेष स्तर की बुद्धि, दार्शनिक क्षमता या ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती है (गलातियों 3:28; 1 कुरिन्थियों 1:20, 26)। सच्चाई तो यह है कि, मानव जाति के पास पाप के प्रति अधिक परिष्कृत तरीके को विकसित करने के लिए वृद्धि किए हुए ज्ञान का उपयोग करने की एक दुर्भाग्यपूर्ण आदत है।

आत्मिक धोखे को समझने की कुँजी सत्य में यह है कि हम अक्सर उसे चुनते हैं जिसे हम विश्वास करना चाहते हैं, इसकी अपेक्षा कि हमें जिस पर विश्वास करना चाहिए (लूका 16:31)। "उसने उनके सामने इतने चिह्न दिखाए, तौभी उन्होंने उस पर विश्‍वास न किया" (यूहन्ना 12:37)। ध्यान दें कि वे चिन्हों को प्रगट होने के बाद भी यीशु पर विश्वास नहीं करेंगे। उनका अविश्वास स्वेच्छा से था।

हव्वा का पाप में गिरना इसका सबसे पहला उदाहरण है कि आत्मिक धोखा कैसे काम करता है। जब सर्प ने उससे पूछा, "क्या सच है कि परमेश्वर ने कहा है कि...?" हव्वा ने परमेश्वर की कही गई बातों का उत्तर देते हुए कहा, यद्यपि उसने आज्ञा में जोड़ दिया था (उत्पत्ति 3:1-3)। वह जानती है कि क्या करना है और क्या नहीं करना है। सर्प तब उसे पेड़ के फल में से जो कुछ भी प्राप्त हो सकता था, उसकी प्राप्ति की परीक्षा में डाल देता है (उत्पत्ति 3:4-5), और वह फल के अन्य आकर्षक पहलुओं के ऊपर ध्यान देती है (उत्पत्ति 3:6)। हव्वा से झूठ बोला गया था, और सर्प धूर्त था (2 कुरिन्थियों 11:3), परन्तु उसने अन्ततः परमेश्वर की अवज्ञा करना चुना, यद्यपि वह आज्ञा को जानती थी।

जब उसका सामना पाप से हुआ, तो हव्वा ने कहा, "सर्प ने मुझे धोखा दिया, और मैंने खाया" (उत्पत्ति 3:13ब)। शब्द "धोखे" के लिए इब्रानी भाषा का मूल शब्द तात्पर्य छल और कपट के अर्थ को देता है। हव्वा को धोखा दिया गया था, परन्तु तौभी इस विषय में उसके पास एक विकल्प था। उसने परमेश्वर-प्रदत्त स्वतन्त्र इच्छा को गलत विकल्प चुनने के लिए प्रयोग किया, जो उसके लिए परमेश्वर की इच्छा थी, उसके ऊपर आमोद-प्रमोद और व्यक्तिगत् लालसा की चाहत की।

यही प्रक्रिया आज भी काम कर रही है। शैतान हमारी स्वाभाविक इच्छाओं की ओर आकर्षण उत्पन्न करता है और हमें इन्हें ऐसे तरीकों से पूरा करने का आग्रह करता है जो परमेश्वर को अपमानित करते हैं। आत्म-सन्तुष्टि के लिए हमारी इच्छा शैतान के धोखे को और अधिक शक्तिशाली बना देती है।

परमेश्वर ने उद्धारकर्ता को भेजा है (यूहन्ना 3:16), वह संसार को स्वयं के संकेतों से भरता है (रोमियों 1:20), वह स्वयं को उन लोगों के लिए उपलब्ध कराता है जो उसे चाहते हैं (व्यवस्थाविवरण 4:29), और वह जो भी उसके पास आता है उसे सुरक्षित करता है (यूहन्ना 6:37)। जब लोग परमेश्वर के "स्पष्ट रूप" से दिखाई दिए हुए रूप को अस्वीकार कर देते हैं (रोमियों 1:20), तो यह उनको अन्धेरा किए हुए "मूर्ख मनों" (वचन 21), मूर्तिपूजा (वचन 23), और यौन अशुद्धता (वचन 24) के चलते रहने वाले चक्र की ओर ले जाता है। अन्त में, मानव जाति ने "परमेश्वर की सच्चाई को बदल कर झूठ बना डाला" है (वचन 25)। दूसरे शब्दों में, मानव जाति का आत्मिक धोखा प्रत्यक्ष रूप से स्पष्ट सत्य को इन्कार करने का प्रत्यक्ष परिणाम है। अविश्वासी ने एक — एक सत्य को — झूठ से बदल लिया है और शैतान सत्य के स्थान पर झूठ की एक सुविधाजनक विस्तृत सारिणी को प्रस्तुत करते हुए पापी को प्रसन्न करता है ताकि वह उसमें से ही चुनाव कर ले।

जो कोई भी परमेश्वर का विरोध करता है वह आत्मिक धोखे में पड़ जाता है (2 थिस्सलुनीकियों 2:8-10)। उसके स्वभाव में एक शून्य उत्पन्न हो जाता है, और सत्य के हटा दिए जाने के द्वारा निर्मित शून्य शीघ्र ही सत्य से कम किसी भी बात से भर जाएगा। सच्चाई का त्याग कर दें, और आप किसी भी बात के ऊपर विश्वास करेंगे।

हव्वा ने इसलिए पाप नहीं किया क्योंकि वह आशारहित होते हुए एक शैतानिक शक्ति के द्वारा मात खा गई थी, जिसने उसे गलत को यह सोचते हुए करने दिया कि वह सही कर रही है। हाँ, उससे झूठ बोला गया था, परन्तु उसने झूठ को सुनना चुना। उसके बाद उसने उसमें लालसा दिखाई दी जिसे करना मना था और अन्त में, उसने एक उत्तम जीवन की आशा में फल को खा लिया।

सभी मानवीय पाप मनुष्य के चुनाव में आधारित हैं (1 कुरिन्थियों 10:13)। जब हम सच्चाई को अस्वीकार करते हैं, तो हम स्वयं को झूठ के प्रति संवेदनशील बनाते हैं। आत्मिक सत्य की बार-बार अस्वीकृति करना आत्मिक धोखे को एक ईश्वरीय परिणाम के रूप में लाती है।

परमेश्वर अक्सर आत्मिक धोखे को इच्छापूर्ण किए हुए पाप के दण्ड के रूप में देता है, और अपने जीवन में इस बात की जागरूकता को उत्पन्न करने के लिए हमें कितना अधिक उसकी आवश्यकता है जो स्वयं सत्य, हमारा प्रभु यीशु मसीह है (यूहन्ना 14:6)।

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