एक दिन-की आयु का सिद्धान्त क्या है?


प्रश्न: एक दिन-की आयु का सिद्धान्त क्या है?

उत्तर:
यद्यपि मूसा ने लगभग 3,400 वर्षों पहले उत्पत्ति की पुस्तक लिखी थी, परन्तु पिछली कुछ सदियों में प्रकृति और सृष्टि की रचना के ऊपर गम्भीर विवाद विकसित हुआ है। परिणामस्वरूप, अब सृष्टि के वृतान्त के सम्बन्ध में कई सिद्धान्त पाए जाते हैं, और उनमें से एक को एक दिन-की आयु का सिद्धान्त कहा जाता है। मूलरूप से, यह एक ऐसी धारणा है कि उत्पत्ति के पहले अध्याय में कहे गए "दिन" क्रमिक अवधि वाले हैं और शाब्दिक रूप से 24 घण्टे के नहीं हैं। इसलिए, प्रत्येक दिन, एक लाख या अधिक वर्षों जैसी अनिर्धारित, समय की अनिश्‍चित अवधि, लम्बे समय तक की अवधि का प्रतिनिधित्व करने के लिए सोचा गया है। अनिवार्य रूप से, यह एकेश्‍वरवादी आधारित विकासवाद के साथ पवित्रशास्त्र के अनुरूप बनाने, या कम से कम पृथ्वी की अत्यधिक "पुराने" होने की धारणा को सही प्रमाणित करने का प्रयास है।

विज्ञान ने कभी भी बाइबल के एक शब्द को भी अस्वीकृत नहीं किया है। बाइबल सर्वोच्च सत्य है और यही वह मापदण्ड होनी चाहिए जिसके द्वारा वैज्ञानिक सिद्धान्त का मूल्यांकन किया जाना चाहिए। कुछ विषयों में, सृष्टि की उत्पत्ति के लिए दिए गए वैकल्पिक सिद्धान्त विशेष रूप से समीकरणों में से परमेश्‍वर को हटाने की ही मंशा रखते हैं। एक दिन-की आयु के सिद्धान्त को मानने वाले सिद्धान्तवादी निश्‍चित रूप से परमेश्‍वर को हटाने का प्रयास नहीं कर रहे हैं; अपितु, वे विज्ञान की ओर आधुनिक दृष्टिकोण के साथ बाइबल के पारम्परिक विचारों को सुसंगत बनाने का प्रयास कर रहे हैं। कुल मिलाकर, इस तरह के दृष्टिकोण का उपयोग सावधानी से किया जाना चाहिए। उत्पत्ति की सच्चाई या प्रेरणा के ऊपर प्रश्न उठाने का सबसे बुरा परिणाम यह होता है कि यह परमेश्‍वर के वचन के प्रत्येक अंश के ऊपर प्रश्न उठाए जाने की ओर ले जाता है, जो हमारी प्राथमिकताओं से सहमत नहीं होता है। पवित्रशास्त्र के द्वारा पाप और मृत्यु के बारे में दी जाने वाली सारी शिक्षा के लिए उत्पत्ति के पहले तीन अध्यायों का त्रुटिहीन होना आवश्यक है। जिसमें जो कुछ कहा गया है, उसका अर्थ यह है, कि एक दिन-की आयु के सिद्धान्त के समर्थकों द्वारा दिए गए कुछ तर्कों की समीक्षा की जानी चाहिए।

एक दिन-की आयु के सिद्धान्त के अनुयायी अक्सर इंगित करते हैं कि इब्रानी भाषा में "दिन" के लिए उपयोग किया जाने वाला शब्द योम कभी-कभी समय की एक अवधि को भी सन्दर्भित करता है, जो शाब्दिक रूप से 24-घण्टे के दिन से अधिक होता है। विशेष रूप से पवित्रशास्त्र का एक सन्दर्भ अक्सर इस सिद्धान्त के समर्थन के लिए देखा जा सकता है, यह 2 पतरस 3:8 है, "... प्रभु के यहाँ एक दिन हज़ार वर्ष के बराबर है, और हज़ार वर्ष एक दिन के बराबर है।" यह सन्दर्भ निश्‍चित रूप से हमें स्मरण दिलाता है कि परमेश्‍वर समय के परे है और हमें बाइबल की भविष्य में घटित होने वाली घटना (जैसे, दूसरा आगमन) के ऊपर इसलिए सन्देह नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि यह हमारे सीमित मानवीय दृष्टिकोण के कारण बहुत अधिक समय ले रहा है। एक दिन-की आयु के सिद्धान्त के विरोधियों के अनुसार, 2 पतरस 3:8 का सृष्टि वाले सप्ताह की लम्बाई से कोई लेना देना नहीं है।

उत्पत्ति के पहले अध्याय में प्रत्येक दिन साँझ और भोर होने के रूप में वर्णित है। वास्तव में, इन दो शब्दों - साँझ और भोर – का उपयोग पुराने नियम में बड़े पैमाने पर किया गया है, और अधिकांश परिस्थितियों में वे सामान्य दिनों का उल्लेख करते हैं। भाषा की दृष्टि से बोलते हुए कहना, एक दिन-की आयु के सिद्धान्त के विरोधी ध्यान आकर्षित करते हैं, कि यदि मूसा लम्बे समय को व्यक्त करना चाहता था, तो वह शब्द योम के स्थान पर ओलाम या क़ेडेम जैसे स्पष्ट शब्दों का उपयोग कर सकता था।

एक दिन-की आयु के सिद्धान्त का प्रतिपादन करने वाले रूपक के रूप में दिए "दिन" के लिए एक अन्य तर्क यह देते है कि सूर्य को तब तक नहीं बनाया गया था, जब तक कि चौथा दिन नहीं आ गया था। इसे ध्यान में देखते हुए, पारम्परिक, 24 घण्टे का दिन (अर्थात्, दिन और रात) इससे पहले कैसे हो सकता था? एक दिन-की आयु के सिद्धान्त के विरोधियों का तर्क है, कि तकनीकी रूप से दिन और रात के लिए सूर्य की आवश्यकता नहीं है। जिस की आवश्यकता है, वह मात्र प्रकाश और घूमती हुई पृथ्वी का होना है। "साँझ और भोर" एक घूर्णन करती हुई पृथ्वी को इंगित करता है, और जहाँ तक प्रकाश का सम्बन्ध है, यह परमेश्‍वर की पहली आज्ञा थी "उजियाला हो जा" और सूर्य के आगमन से पहले ही प्रकाश अस्तित्व में था (उत्पत्ति 1:3)। हमारे सृष्टिकर्ता ने अन्धेरे से प्रकाश को सबसे पहले अलग किया।

एक दिन- की आयु के विरोधी इस ओर भी ध्यान आकर्षित करते हैं, कि प्रकाशितवाक्य 21:23 में, हम देखते हैं कि नए यरूशलेम के ऊपर "सूर्य और चाँद के उजियाले की आवश्यकता नहीं है" क्योंकि "परमेश्‍वर का तेज" ही "उजियाला" प्रदान करेगा। सृष्टि के आरम्भ में, परमेश्‍वर का तेज से भरा हुआ उजियाला तब तक पर्याप्त हो सकता था, जब तक कि तीन दिन बाद प्रकाश देने वाले गणों को नहीं रचा गया।

इसके अतिरिक्त, एक दिन- की आयु के सिद्धान्त के अधीन, बीमारी, पीड़ा और मृत्यु की अधिकांश व्याख्याएँ मनुष्य के पाप में पतित होने से पहले अस्तित्व में होनी चाहिए। पवित्रशास्त्र स्पष्ट रूप से इंगित करता है कि "एक मनुष्य [आदम] के द्वारा पाप जगत में आया, और पाप के द्वारा मृत्यु आई" (रोमियों 5:12)।

आदम के द्वारा आज्ञा की अवहेलना करने वाली गतिविधि से पहले अदन की वाटिका में कोई मृत्यु नहीं थी, या, जैसा कि एक दिन - की आयु के दृष्टिकोण में विश्‍वास रखने वाले कहते हैं, आदम के पाप करने से पहले मानवीय मृत्यु नहीं थी। मनुष्य की उत्पत्ति के साथ एक दिन - की आयु के सिद्धान्त को कैसे अनुरूप किया जाता है, इस बात पर निर्भर करता है कि यह पाप में गिरने के सिद्धान्त को अवैध घोषित कर सकता है। यह प्रायश्‍चित्त के सिद्धान्त को भी निरस्त कर देगा, क्योंकि यदि कोई पाप में पतित ही नहीं हुआ, तो हमें छुटकारा देने वाले की आवश्यकता ही क्यों होगी?

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