रोमांस के प्रति मसीही दृष्टिकोण क्या होना चाहिए?


प्रश्न: रोमांस के प्रति मसीही दृष्टिकोण क्या होना चाहिए?

उत्तर:
इस लेख के प्रयोजनों की प्राप्ति के लिए, शब्द रोमांस या रूमानी प्रेम अर्थात् प्रीति को भावनात्मक उत्तेजना या आकर्षण के रूप में परिभाषित किया जाएगा जिसमें एक विशेष व्यक्ति या स्थिति एक पुरूष स्त्री को एक दूसरे की ओर आकर्षित करता या करती है। इस तरह का रोमांस हमारी संस्कृति में अत्यन्त लोकप्रिय विषय है। संगीत, फिल्में, नाटक, और पुस्तकें रोमांटिक प्रेम के आकर्षणों से भरी पड़ी हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि इनकी अभिव्यक्तियों अन्तहीन हैं। मसीही वैश्‍विक दृष्टिकोण में, क्या रोमांस अच्छा या बुरा है या इनमें से कहीं बीच का विषय है?

बाइबल को मनुष्य के लिए परमेश्‍वर का प्रेम पत्र कहा गया है। यद्यपि इसमें परमेश्‍वर के न्याय के बारे में कठोर चित्र और चेतावनियाँ सम्मिलित हैं, परन्तु बाइबल मनुष्यों और परमेश्‍वर के बीच प्रेम की रचनात्मक अभिव्यक्तियों से भरी हुई है (भजन संहिता 42:1-2; यिर्मयाह 31:3)। परन्तु प्रेम और रोमांस, यद्यपि आपस में बुने हुए होने पर भी, एक जैसे नहीं हैं। हम वास्तव प्रेम के बिना रोमांस कर सकते हैं, और हम रोमांटिक हुए बिना भी प्रेम कर सकते हैं। जबकि सपन्याह 3:17 जैसे सन्दर्भों में परमेश्‍वर के भावनात्मक प्रेम का वर्णन किया गया है, अन्य सन्दर्भों जैसे कि 1 कुरिन्थियों 13:4-8 में प्रेम के विस्तारित गुण दिए गए हैं, जिसमें रोमांस की भावनाओं का कोई लेना-देना नहीं हैं। यीशु ने कहा, "इससे बड़ा प्रेम किसी का नहीं कि कोई अपने मित्रों के लिये अपना प्राण दे" (यूहन्ना 15:13)। अकृतज्ञता से भरे हुए पापियों के लिए एक क्रूस के ऊपर एक दु:ख से भरी हुई मृत्यु से मरना रोमांटिक नहीं था, परन्तु यह प्रेम की अन्तिम अभिव्यक्ति थी (1 यूहन्ना 4:9 और; 10)।

श्रेष्ठगीत एक दुल्हे और दुल्हन के बीच प्रेम के रोमांटिक प्रदर्शन से भरी हुई पुस्तक है। क्योंकि परमेश्‍वर ने इस पुस्तक को उसके मानक प्रेरित वचन के रूप में सम्मिलित किया है, इसलिए हम सुरक्षित रूप से कह सकते हैं कि रोमांस हमारे निर्माता के द्वारा अनुमति प्राप्त है। एक शुद्ध और प्रतिबद्ध सम्बन्ध के सन्दर्भ में रोमांस उस सम्बन्ध में वृद्धि कर सकता है और विवाहित प्रेम के आनन्द को बढ़ा सकता है क्योंकि यही परमेश्‍वर की मंशा है।

तथापि, रोमांस मात्र मस्ती के लिए विनाशकारी हो सकता है। अधिकांश रोमांस "प्रेम में पड़ने" की मोहक भावना से आरम्भ होते हैं, जो कि बहकाने वाले हो सकते हैं। "प्रेम में पड़ने" की गतिविधि मस्तिष्क में एक रासायनिक जलप्रलय को उत्पन्न कर देता है, ठीक वैसे ही जैसा कि नशीली दवा के उपयोग के द्वारा अनुभव किया जाता है। मस्तिष्क एड्रेनालाईन, डोपामाइन, और सेरोटोनिन (ऐसे रसायन जिनसे हम अच्छा महसूस करते हैं) के कारण सोचना बन्द कर देता है, जो हमें उसी भावना के स्रोत की ओर वापस लौटने का कारक बन जाते हैं। परन्तु, हमारे मस्तिष्क की प्रतिक्रिया के कारण, रोमांस करना एक लत बन सकता है। रोमांस से भरे हुए उपन्यासों, रोमांटिक फिल्मों, और यौन सम्बन्धी विषयों के ऊपर आधारित टीवी शो के ऊपर ध्यान देते रहना हमारे वास्तविक-जीवन के सम्बन्धों में अवास्तविक अपेक्षाओं को उत्पन्न कर देते हैं।

शोधकर्ताओं का अनुमान है कि मानवीय मस्तिष्क केवल दो वर्षों तक ही "प्रेम में" पड़े होने की भावना की तीव्रता को संभाल सकता है। अपने आदर्शमयी रूप में, एक जोड़े ने उस समय की अवधि में अपने प्रेम और प्रतिबद्धता के आधार पर सम्बन्ध को निर्मित करने के ऊपर कार्य कर लिया होता है, जिस से जब "प्रेम में" पड़े होने की तीव्र भावनाएँ कम हो जाती हैं, तो गहरा प्रेम इसका स्थान ले लेता है। तथापि, जो लोग रोमांस अर्थात् प्रीति करने के लिए "आदी" हैं, यह उनमें इस संकेत को कम करते हुए उनमें इस भावना को उत्पन्न करता है कि अब किसी दूसरे को ढूँढने का समय आ गया है, जो उनमें एक नए उत्साह को भर देगा। नए "सम्बन्धों को पाने की लत" का निदान पाए हुए कुछ लोग, वास्तव में, "प्रेम में पड़ने" के द्वारा उत्पन्न होने वाली भावनाओं के आदी हो सकते हैं। इस प्रकार, वे उस भावना को पुन: उत्पन्न करने का प्रयास करते रहते हैं।

इस विवरण को ध्यान में रखते हुए, यह देखना आसान है कि प्रेम और रोमांस क्यों आवश्यक रूप से एक जैसे नहीं है। बाइबल उन जोड़ों के कई उदाहरणों को प्रस्तुत करती है, जिन्होंने रोमांटिक प्रेम और उन रोमांस से होने वाले परिणामों का अनुभव किया है। उत्पत्ति 29 हमें राहेल के साथ प्रेम में पड़ने वाले याकूब की कहानी को बताता है। वह उससे विवाह करने के लिए अपने पिता के लिए सात वर्षों तक काम करने के लिए तैयार था। वचन 20 कहता है कि ये सात वर्षों "उसे राहेल के साथ प्रीति के कारण थोड़े ही दिन के बराबर जान पड़े।" यद्यपि याकूब की कहानी प्रत्येक को धोखा मिलने, मन की पीड़ा और निराशा के साथ आगे बढ़ती रहती है, परन्तु राहेल के साथ उसके रोमांस की पवित्रशास्त्र में निन्दा नहीं की गई है। यद्यपि, रोमांस ने शिमशोन को परेशानी में डाल दिया था, जब उसने अपनी भावनाओं के अपने ऊपर शासन करने दिया। न्यायियों अध्याय 14 में शिमशोन के पतन के आरम्भ का विवरण दिया गया है, जब उसने रोमांस के प्रति परमेश्‍वर के निर्देशों का पालन करने के स्थान पर अपने निर्णयों के द्वारा निर्देशित होने के लिए स्वयं को दे दिया।

रोमांस या तो नकारात्मक या फिर सकारात्मक इस बात पर निर्भर होते हुए हो सकता है कि हम उन भावनाओं को अपने जीवन में शासन करने देते हैं या नहीं। जब हम अपनी भावनाओं का अनुसरण कर रहे होते हैं, तो हम नैतिकता और वैवाहिक जीवन की परेशानी में पड़ सकते हैं। यिर्मयाह 17:9 कहता है, "मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देनेवाला होता है, उस में असाध्य रोग लगा है; उसका भेद कौन समझ सकता है?" लोकप्रिय कथन "अपने मन की करो" एक भयानक परामर्श है। जब हम अपने मन के जुनूनों का अनुसरण करते हैं, तो हम आसानी से धोखे, पाप में पड़ जाते और यह दु:खों की प्राप्ति के कारण बन जाते हैं। रोमांस का अनुसरण करने की अपेक्षा, हमें अपने सम्बन्धों में पवित्र आत्मा की अगुवाई को प्राप्त करना चाहिए। प्रेम का अनुसरण करना सदैव बुद्धिमान से भरा हुआ होता है (1 कुरिन्थियों 14:1)। तत्पश्‍चात्, जब किसी के प्रति प्रेम से भरा हुआ आकर्षण उत्पन्न हो जाते है, तो हमारे पास ईश्‍वरीय रोमांस हमारे स्वर्गीय पिता की ओर से एक वरदान के रूप में हो सकता है (याकूब 1:17)।

English



हिन्दी के मुख्य पृष्ठ पर वापस जाइए
रोमांस के प्रति मसीही दृष्टिकोण क्या होना चाहिए?