मन की शान्ति पाने के बारे में बाइबल क्या कहती है?


प्रश्न: मन की शान्ति पाने के बारे में बाइबल क्या कहती है?

उत्तर:
अधिकांश लोग "मन की शान्ति" को मानसिक तनाव और चिन्ता की अनुपस्थिति के रूप में परिभाषित करेंगे। बाइबल में "मन की शान्ति" के जैसा ही कुछ 2 कुरिन्थियों 2:13 में पाया जाता है, जहाँ पौलुस का कहना है कि उसे "मन की शान्ति" नहीं मिली क्योंकि उसे त्रोआस में तीतुस नहीं मिला था। इस वाक्यांश का शाब्दिक अनुवाद "मेरी आत्मा को चैन" नहीं मिला है।

बाइबल शब्द शान्ति का उपयोग कई भिन्न तरीकों से करती है। शान्ति कभी-कभी परमेश्‍वर और मनुष्य के बीच मित्रता की अवस्था को भी सन्दर्भित करती है। एक पवित्र परमेश्‍वर और पापी मनुष्य के बीच की शान्ति, मसीह की बलिदानात्मक मृत्यु से प्रभावित हुई है, जिसने "अपने और उस के क्रूस पर बहे हुए लहू के द्वारा मेलमिलाप" कर दिया (कुलुस्सियों 1:20)। इसके अतिरिक्त, महायाजक के रूप में प्रभु यीशु सभों की ओर से मित्रता की उस अवस्था को बनाए रखता है, जो "उसके द्वारा परमेश्‍वर के पास आते हैं, वह उनका पूरा पूरा उद्धार कर सकता है, क्योंकि वह उनके लिये विनती करने को सर्वदा जीवित है" (इब्रानियों 7:25)। परमेश्‍वर के साथ मित्रता की यह अवस्था दूसरी तरह की शान्ति के लिए एक पूर्व निर्धारित शर्त है, जो कभी-कभी एक शान्त मन को सन्दर्भित करती है। यह केवल तभी होता है, जब "हम विश्‍वास से धर्मी ठहरे, तो अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्‍वर के साथ मेल रखें" (रोमियों 5:1) कि हम मन की सच्ची शान्ति का अनुभव कर सकते हैं, जो पवित्र आत्मा का एक फल है, दूसरे शब्दों में, उसका फल हम में प्रदर्शित होता है (गलातियों 5:22–23)।

यशायाह 26:3 हमें बताता है कि यदि हमारे मन परमेश्‍वर के ऊपर "केन्द्रित" है, तो परमेश्‍वर हमें ''पूर्ण शान्ति'' में रखेगा, जिसका अर्थ है कि हमारा मन उसी पर निर्भर है, उसी पर केन्द्रित है, और उस पर भरोसा रखे हुए है। हमारे मन की शान्ति "सिद्ध" या उस सीमा तक अपूर्ण है कि "मन स्वयं पर या स्वयं की समस्याओं की अपेक्षा" परमेश्‍वर के ऊपर टिका हुआ है। शान्ति का अनुभव होता है, क्योंकि हम बाइबल की पुस्तक भजन संहिता 139:1-12 में परमेश्‍वर की निकटता और उसकी अच्छाई और सामर्थ्य, उसकी दया और उसकी सन्तान के लिए प्रेम और जीवन की सभी परिस्थितियों के ऊपर उसकी सम्पूर्ण प्रभुता के बारे में विश्‍वास करते हैं। परन्तु हम किसी ऐसे व्यक्ति पर भरोसा नहीं कर सकते हैं, जिसे हम नहीं जानते हैं, और इसलिए यह शान्ति के राजकुमार यीशु मसीह को जानने के लिए महत्वपूर्ण है।

प्रार्थना के परिणामस्वरूप शान्ति का अनुभव होता है। “किसी भी बात की चिन्ता मत करो; परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्‍वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ। तब परमेश्‍वर की शान्ति, जो सारी समझ से परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी” (फिलिप्पियों 4:6-7)।

एक शान्त मन और हृदय को इस पहचान के परिणामस्वरूप अनुभव किया जाता है कि एक परम बुद्धिमान और प्रेम करने वाले पिता के पास हमारी परीक्षाओं के लिए एक उद्देश्य है। "हम जानते हैं कि जो लोग परमेश्‍वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं; अर्थात् उन्हीं के लिये जो उसकी इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं" (रोमियों 8:28)।

परमेश्‍वर हमारे द्वारा अनुभव की जाने वाली पीड़ाओं से शान्ति सहित कई प्रकार की अच्छी बातों को ला सकते हैं। यहाँ तक कि प्रभु का अनुशासन और सुधार हमारे जीवन में “चैन के साथ धर्म के प्रतिफल” को उत्पन्न करेगा (इब्रानियों 12:11)। वे "परमेश्‍वर में आशा" और अन्ततः "उसकी स्तुति" करने के लिए एक नया अवसर प्रदान करते हैं (भजन संहिता 43:5)। जब वे इसी तरह की परीक्षाओं में होकर निकलते हैं, तो वे हमें "सांत्वना" देने में सहायता करते हैं (2 कुरिन्थियों 1:4), और वे "हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है" (2 कुरिन्थियों 4:17)।

मन की शान्ति और आत्मा की शान्ति इसके साथ ही उपलब्ध होती है, जब हम अपने पापों के लिए क्रूस पर मसीह के बलिदान के माध्यम से परमेश्‍वर के साथ सच्ची शान्ति के ऊपर विश्‍वास करते हैं। जो लोग सांसारिक गतिविधियों में शान्ति खोजने का प्रयास करते हैं, वे स्वयं को दुर्भाग्य से धोखे में पाएंगे। यद्यपि, मसीहियों के लिए, मन की शान्ति निहित ज्ञान के माध्यम से, और इस बात के पूर्ण विश्‍वास में उपलब्ध है, कि परमेश्‍वर "भी अपने उस धन के अनुसार जो महिमा सहित मसीह यीशु में है, तुम्हारी हर एक घटी को पूरी करेगा" (फिलिप्पियों 4:19)।

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