बाइबल पाखण्ड के बारे में क्या कहती है?


प्रश्न: बाइबल पाखण्ड के बारे में क्या कहती है?

उत्तर:
अपने सार में, "पाखण्ड" किसी वस्तु पर विश्‍वास करने के दावे को उद्धृत करता है, परन्तु एक भिन्न तरीके से कार्य करता है। बाइबल का शब्द "अभिनेता" जिस यूनानी शब्द से निकल कर आया है – शाब्दिक रूप से वह एक ऐसे व्यक्ति को बारे में बताता है, "जो मुखौटा पहनता है" - दूसरे शब्दों में, एक ऐसा व्यक्ति जो वह नहीं है, परन्तु होने का दिखावा कर रहा है।

बाइबल पाखण्ड को पाप कहती है। पाखण्ड के दो रूप हो सकते हैं: किसी वस्तु में विश्‍वास का होना और फिर उस विश्‍वास के विपरीत काम करना, और जब हम स्वयं दोष में होते हैं, तो दूसरों को नीचा दिखाने का प्रयास करना।

भविष्यद्वक्ता यशायाह ने उसके दिनों में पाखण्ड की निन्दा की थी: “प्रभु ने कहा, 'ये लोग जो मुँह से मेरा आदर करते हुए समीप आते परन्तु अपना मन मुझ से दूर रखते हैं, और जो केवल मनुष्यों की आज्ञा सुन सुनकर मेरा भय मानते हैं'” (यशायाह 29:13) सदियों पश्‍चात्, यीशु ने इस वचन को उद्धृत किया, जिसका उद्देश्य उसके दिन के धार्मिक अगुवों की निन्दा करना था (मत्ती 15: 8-10)। बपतिस्मा देने वाले यूहन्ना ने बपतिस्मा लेने के लिए आने वाली कपटी भीड़ को "साँप के बच्चे" कहा और पाखण्डियों को "मन फिराव के योग्य फल लाने" के चेतावनी दी (लूका 3:7–9 को देखें)। यीशु ने पवित्रता के विरूद्ध समान रूप से कठोर दृष्टिकोण अपनाया - उसने कपटी लोगों को "भेड़ के भेस में भेड़ियों" (मत्ती 7:15), "चूना फिरी हुई कब्रों" (मत्ती 23:27), "सांपों," और "कपटियों के झुण्ड" कहा (मत्ती 23:33)।

हम यह नहीं कह सकते कि हम परमेश्‍वर से प्रेम करते हैं, यदि हम अपने भाइयों से प्रेम नहीं करते (1 यूहन्ना 2:9)। प्रेम "बिना पाखण्ड के" होना चाहिए (रोमियों 12:9)। एक पाखण्डी बाहर से तो धर्मी दिखाई दे सकता है, परन्तु यह एक बहाना मात्र होता है। सच्ची धार्मिकता पवित्र आत्मा के आन्तरिक परिवर्तन से आती है, जो नियमों के एक समूह के पालन करने की पुष्टि नहीं होती है (मत्ती 23:5; 2 कुरिन्थियों 3:8)।

यीशु ने पहाड़ी पर दिए उपदेश में पाखण्ड के दूसरे रूप को भी सम्बोधित किया है: “तू क्यों अपने भाई की आँख के तिनके को देखता है, और अपनी आँख का लट्ठा तुझे नहीं सूझता? जब तेरी ही आँख में लट्ठा है, तो तू अपने भाई से कैसे कह सकता है, ‘ला मैं तेरी आँख से तिनका निकाल दूँ?’ हे कपटी, पहले अपनी आँख में से लट्ठा निकाल ले, तब तू अपने भाई की आँख का तिनका भली भाँति देखकर निकाल सकेगा”(मत्ती 7:3-5)। यीशु समझ के विरूद्ध शिक्षा नहीं दे रहा या न ही दूसरों को पाप के ऊपर जय पाने की शिक्षा दे रहा था; इसकी अपेक्षा, वह हमसे कह रहा है कि हम अपनी स्वयं की भलाई के लिए इतने अधिक अभिमानी और आश्‍वस्त नहीं हो सकते हैं कि हम दूसरों की आलोचना स्वयं-की-धार्मिकता पर आधारित हो कर करें। हमें पहले से ही स्वयं की जाँच करनी चाहिए और अपनी कमियों को सुधारना चाहिए इससे पहले कि हम दूसरों की आँख में "लट्ठे" का पता लगाएँ (इसकी तुलना रोमियों 2:1 से करें)।

यीशु की पार्थिव सेवकाई के समय, के दिन के धार्मिक अगुवों, फरीसियों के साथ उसका कई बार टकराव हुआ। ये लोग पवित्रशास्त्र के अच्छे जानकार थे और व्यवस्था के प्रत्येक अक्षर का पालन करने के बारे में उत्सुक रहते थे (प्रेरितों के काम 26:5)। तथापि, व्यवस्था के प्रत्येक अक्षर का पालन करने में, उन्होंने सक्रिय रूप से इसमें कमियों की खोज की, जिससे उन्हें व्यवस्था की भावना का उल्लंघन करने की अनुमति मिल गई। इसके अतिरिक्त, उन्होंने अपने साथियों के प्रति करुणा की कमी का प्रदर्शन किया और प्रशंसा पाने के लिए अक्सर अपनी तथाकथित आत्मिकता का प्रदर्शन किया (मत्ती 23:5–7; लूका 18:11)। यीशु ने बिना किसी अनिश्‍चित शब्दों के उनके व्यवहार की निन्दा, यह इंगित करते हुए की कि "न्याय, दया और विश्‍वासयोग्यता" का अनुसरण करना दोषपूर्ण मापदण्डों की पूर्णता से अधिक महत्वपूर्ण हैं (मत्ती 23:23)। यीशु ने स्पष्ट किया कि समस्या व्यवस्था के साथ नहीं थी, परन्तु उस तरीके के साथ जिस तरह से फरीसियों ने इसे लागू किया था (मत्ती 23:2-3)। आज, शब्द फरीसी पाखण्डी शब्द का पर्याय बन गया है।

यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि पाखण्ड पाप के विरूद्ध एक दृष्टिकोण को अपनाने जैसे नहीं है। उदाहरण के लिए, यह शिक्षा दिया जाना पाखण्ड नहीं है कि शराब पीना एक पाप है, यदि हमने शराब पी हुई है। मसीही विश्‍वासी कभी भी सिद्ध नहीं होंगे; हम अब भी पाप करते रहेंगे। बाइबल के मापदण्डों पर पूरा न उतरना पाखण्ड नहीं है, अपितु यह कहना कि हम परमेश्‍वर के ऊपर विश्‍वास करते हैं और उसकी आज्ञा का पालन करना चाहते हैं और तत्पश्‍चात् ऐसा करने का प्रयास न करना पाखण्ड है। नशे के विरूद्ध शिक्षा देना पाखण्ड होगा और ठीक उसी समय प्रत्येक साप्तांत नशे में धुत हो जाना। यह पाखण्ड होगा क्योंकि शराब कोई पाप नहीं है, जिसके साथ हम संघर्ष करते हैं, हम उन लोगों की तुलना में परमेश्‍वर के अनुग्रह को कम मात्रा में पाने के प्राप्तकर्ता हैं, जो इससे छुटकारा पाने के लिए संघर्षरत् हैं।

परमेश्‍वर की सन्तान के रूप में, हमें पवित्रता को पाने के लिए प्रयास करने के लिए कहा गया है (1 पतरस 1:16)। हमें "बुराई से घृणा करना;" और "भलाई में लगे रहना" है (रोमियों 12:9)। हमें कभी भी विशेष रूप से अपने जीवन में पाप को स्वीकार नहीं करना चाहिए। हम जो कुछ करते हैं, उसे जो कुछ हम विश्‍वास करते हैं, उसके अनुरूप होना चाहिए और हम जो मसीह में हैं, उसके अनुरूप होना चाहिए। नाटक वाला-अभिनय मंच प्रस्तुति के लिए होता है, वास्तविक जीवन के लिए नहीं होता है।

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