मैं अपने मसीही जीवन में पाप पर विजय कैसे प्राप्त कर सकता हूँ?



प्रश्न: मैं अपने मसीही जीवन में पाप पर विजय कैसे प्राप्त कर सकता हूँ?

उत्तर:
अपनी पाप पर विजय के लिये बाइबल निम्नलिखित स्त्रोतों के विषय में बात करती है जो हमारे पास हैं : (1) पवित्र आत्मा - एक वरदान जो परमेश्वर ने हमको (अपनी कलीसियाओं)। मसीही जीवन में विजयी होने के लिए दिया है वो पवित्र आत्मा है । गलतियों ५:१६-२५ में परमेश्वर शरीर के कार्यो तथा आत्मा के फल में विपरीतता बताता है । उस अनुच्छेद में हमसे कहा गया है कि आत्मा के अनुसार चलें । "सारे विश्वासियों के पास पहले से ही पवित्र आत्मा है, परन्तु यह अनुच्छेद हमें यह बताता है कि हमें आत्मा के अनुसार चलने की आवश्यकता है, उसके नियंत्रण के अनुकूल रहकर । इसका अर्थ है पवित्र आत्मा की जागरूकता को चुनकर कार्य करना ना कि शरीर की इच्छा के अनुसार ।

एक विश्वासी के जीवन में पवित्र आत्मा जो अन्तर ला सकती है वो पतरस के जीवन में प्रदर्शित है, जिसने कि पवित्र आत्मा के ग्रहण किये जाने से पहले यीशु का तीन बार इन्कार किया, जबकि उसने कहा था कि वो यीशु का मरते दम तक अनुसरण करेगा । ग्रहण करने के पश्चात उसने यहूदियों से उद्धार के पेन्तीकुस्त पर स्पष्टता तथा साहस के साथ बातें करीं ।

एक व्यक्ति आत्मा के अनुसार चलता है जब वो आत्मा के सुझावों पर "ढक्कन लगाने" का प्रयास नहीं करता (जैसा कि १थिस्सलुनीकियों ५:१९ में कहा है "आत्मा का बुझना) तथा इसके बजाय आत्मा से भर जाने की खोज करता है (इफिसियों ५:१८-२१) । कोई पवित्र आत्मा से कैसे भर जाता है? सबसे पहले, यह परमेश्वर की इच्छा से है जैसा कि पुराने नियम में भी था । उसने पुराने नियम में व्यक्तियों तथा खास घटनाओं को चुना कि वो उसके चुने हुए लोगों को भरे जिससे कि वो उसकी इच्छा का कार्य पूरा करें (उत्पत्ति ४१:३८; निर्गमन ३१:३; गिनती २४:२; १शमूएल १०:१०; वगैरह) । मैं यह मानता हूँ कि इफिसियों ५:१८-२१ तथा कुलुस्सियों ३:१६ में गवाही है कि परमेश्वर उनको मरने के लिए चुनता है जो अपने आप को परमेश्वर के वचन से भर रहे हैं जैसा कि उस सत्य से प्रमाणित होता है कि उन पदों में हर एक के भरे जाने का परिणाम समान है । अतः यह हमें हमारे अगले स्त्रोत पर ले आता है ।

(२) परमेश्वर का वचन, बाइबल - २ तिमुथियुस ३:१६-१७ कहता है कि परमेश्वर ने हमें अपना वचन दिया है कि हम हर भले काम के लिए तत्पर हो जाये । यह हमें शिक्षा देता है कि कैसे जीवन बितायें तथा किसपर विश्वास करें, जब हम गलत मार्ग अपनाते हैं तो यह हमपर प्रकट करता है, हमें वापस सही मार्गों पर आने के लिये यह हमारी सहायता करता है, तथा उसपर बने रहने के लिए हमारी सहायता करता है । जैसा कि इब्रानियों ४:१२ बांटता है कि वो जीवित और प्रबल है, तथा हमारे मन की गहरी से गहरी समस्याओं का जड़ से उखाड़ फेंकने की क्षमता रखता है, जिनपर कि मनुष्य के तौर पर विजयी नहीं हो सकता । भजनकर्ता उसका जीवन बदलने की शक्ति के विषय में भजनों ११९:९; ११, १०५ तथा अन्य पदों में बात करता है । यहोशु को बताया गया था कि उसके शत्रुओं पर उसकी विजय की कूँजी (हमारे आत्मिक युद्ध की समानता) उसको भुलाये ना जाना है बल्कि उसपर रात और दिन ध्यान लगाना है जिससे कि वो उस पर गौर कर सके । यह उसने किया, जबकि जो उसे परमेश्वर ने आदेश दिया था कोई सैन्य भावना नहीं बताती थी, तथा यह उस वचन में में दी गई भूमि के लिए उसके युद्ध में उसकी विजय की कुँजी बनी ।

यह स्त्रोत आमतौर रूप से वो है जिसके साथ हम नगण्य सा व्यवहार करते हैं । हम उसकी सांकेतिक सेवा करते हैं बाइबल को चर्च तक ले जाकर या प्रतिदिन की एक धार्मिकता पढ़कर या एक दिन में एक अध्याय पढ़कर, परन्तु हम उसे स्मरण रखने में, उसपर ध्यान लगाने में, अपने जीवन में उसको लागू करने में, उसके द्वारा प्रकट किए गए पापों को स्वीकारने में, उन वरदानों के लिए परमेश्वर का धन्यवाद करने में जो उसने प्रकट किये, असफल रहते हैं । जब बाइबल की बात आती है तो हम या तो क्षुधानाश होते हैं या उसके विपरीत । या तो हम केवल इतना ग्रहण करते हैं जो हमें आत्मिक रूप से जीवित रखें उस वचन में से खाकर बस जब हम चर्च जाते हैं (परन्तु कभी इतना नहीं निगलने कि स्वस्थ, उन्नतिशील मसीही बनें) या हम अकसर उसे खाते हैं परन्तु कभी भी उसपर इतना ध्यान नहीं लगाते कि हमें उसके द्वारा आत्मिक पोषण मिल सके ।

यह महत्वपूर्ण है कि अगर आपने प्रतिदिन के आधार पर अर्थपूर्ण तरीके से परमेश्वर के वचन को पढ़ने की आदत नहीं डाली है, तथा उसे स्मरण करने की जैसे कि आप अनुच्छेदों पर आते हैं, तो पवित्र आत्मा आपके हृदय पर असर डालता है, कि आप उसकी आदत बनाना शुरू कर देते हैं । मैं आपको यह भी सुझाव दूगा कि आप एक पत्रिका शुरू करें (या फिर कमप्यूटर पर अगर आप लिखने से ज्य़ादा तेज़ टाइपिंग कर सकते हैं तो) या फिर एक नोटबुक, वगैरह । अपनी आदत बनायें कि वचन को नहीं छोडेंगे जब तक आप ने उससे प्राप्त किया हुआ कुछ लिख ना लिया हो । मैं अकसर परमेश्वर से की गई प्रार्थनाओं को रिकार्ड करता हूँ उससे यह कहते हुए कि मुझे उन क्षेत्रों में बदलाव लाने में सहायता करें जिसके बारे में उसने मुझसे बात करी हुई हैं । बाइबल वो हथियार है जो हमारी तथा अन्यों की जिंदगी में आत्मा द्वारा इस्तेमाल की जाती है (इफिसियों ६:१७), उस कवच का एक अनिवार्य हिस्सा जो परमेश्वर ने हमें हमारे आत्मिक युद्धों को लड़ने के लिये दिया है (इफिसियों ६:१२-१८)!

3. प्रार्थना -यह एक अन्य अनिवार्य स्त्रोत है जो परमेश्वर ने दिया है । फिर से, यह एक ऐसा स्त्रोत है जिसको कि मसीही झूठा आदर देते हैं परन्तु उसका खराब उपयोग करते हैं । हमारे यहॉ प्रार्थना सभायें, प्रार्थना का समय, वगैरह होते हैं, परन्तु हम उसका उपयोग नहीं खोज पाते जिसका कि आरंभिक कलीसिया उदाहरण देती है (प्रेरितों के काम ३:१; ४:३१; ६:४; १३:१-३, वगैरह) । पौलुस ने बार-बार यह कहा है कैसे वो प्रार्थना करता था उनके लिए जिनकी वो देख-भाल करता था । ना ही हम ही, जब हम अपने आप में होते हैं , इस महान स्त्रोत का उपयोग करते हैं जो हमें उपलब्ध है । परन्तु परमेश्वर ने प्रार्थना के संबंध में हमसे आश्चर्यजनक वायदे किये हैं (मत्ती ७:७-११; लूका १८:१-८; यूहन्ना ६:२३-२७; १यूहन्ना ५:१४:१५, वगैरह) । तथा फिर से, पौलुस ने अपने आत्मिक युद्ध की तैयारी के लिए शामिल कर लिया (इफिसियों ६:१८)

कितनी महत्वपूर्ण है यह? जब आप पतरस की ओर दुबारा देखेंगे, आपके पास गतसमनिया के बाग में मसीह के द्वारा बोले गए शब्द होगें, पतरस के इन्कार से पहले के । वहाँ पर, जब यीशु प्रार्थना कर रहा था, पतरस सो रहा था । यीशु ने उसको जगाया और कहा, "जागते रहो, और प्रार्थना करते रहो, कि तुम परीक्षा में ना पड़ो : आत्मा तो तैयार है, परन्तु शरीर दुर्बल है" (मत्ती २६:४१) । आप भी, पतरस की तरह, वो करना चाहते हैं जो सही है परन्तु शक्ति नहीं खोज पा रहें हैं । हमें परमेश्वर की डॉट-फटकार की आवश्यकता है जिससे कि हम खोजते रहें, खटखटाते रहें, मांगते रहें ... तथा वो हमें शक्ति देगा जिसकी हमें आवश्यकता है (मत्ती ७:७f) । परन्तु हमें इस स्त्रोत को झूठे आदर से बहुत अधिक देने की आवश्यकता है ।

मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि प्रार्थना चमत्कारी है । यह परमेश्वर नहीं है । परमेश्वर विस्मयकारी है । प्रार्थना तो केवल अपने स्वयं की सीमाओं को तथा परमेश्वर की कभी ना थकने वाली शक्ति को पहचानना है तथा जो वो हमसे कराना चाहता है उसकी शक्ति को पाने के लिए उसकी ओर मुड़ना है (जो हम करना चाहते हैं वो नहीं) (१यूहन्ना ५:१४-१५) ।

4. कलीसया - अंतिम स्त्रोत फिर से वैसा ही है जिसे अनदेखा करने की प्रवृत्ति है । जी यीशु ने अपने चेलों को प्रचार करने बाहर भेजा, उसने दो-दो के जोड़ों में भेजा (मत्ती १०:१) । जब हम प्रेरितों के कामों में मिशनरी यात्राओं को देखते हैं, तो वो प्रचार करने अकेले नहीं जाते थे; परन्तु दो या अधिक लोगों के समूह में । यीशु ने कहा जहाँ दो या तीन मेरे नाम पर इकट्ठे होते हैं, वहॉ मैं उनके बीच में रहता हूँ (मत्ती १८:२०) । वो हमें यह आज्ञा देता है कि हम एक साथ इक्कटठे होने का परित्याग ना करें जैसा कि कुछ लोगों का व्यवहार था, परन्तु उस समय को एक दूसरे के प्रति प्रेम तथा भले कार्यों के प्रोत्साहन में उपयोग करें (इब्रानियों १०:२४-२५) । वो हमसे कहता है कि हम एक दूसरे के सामने अपने पापों को मानें (याकूब ५:१६) । पुराने नियम के ज्ञान के साहित्य में, हमें बताया गया है कि जैसे लोहा लोहे को चमका देता है वैसे ही मनुष्य का मुख अपने मित्र की संगति से चमकदार हो जाता है (नीतिवचन २७:१७) "जो डोरी तीन भागों से बंटी हो वो जल्दी नहीं टूटती" । एक से दो अच्छे हैं (सभोपदेशक ४:११-१२) कुछ लोगों ने जिन्हें मैं जानता हूँ यीशु में भाई या बहनें पायी हैं जो कि फोन पर या व्यक्तिगत रूप में एकत्रित होते हैं तथा यह आपस में बॉटते है कि वो अपने मसीही जीवन में कैसा कर रहें हैं, उन्होंने कितना संघर्ष किया, वगैरह तथा एक दूसरे के लिये प्रार्थना करने का वादा करते हैं तथा अपने संबंधों में परमेश्वर के वचन को लागू करने के लिये एक दूसरे को जवाबदेह मानते हैं।

कभी परिवर्तन जल्दी आ जाता है । कभी, अन्य क्षेत्रा में, धीरे आता है । परन्तु परमेश्वर ने हमसे यह वादा किया है कि जब भी हम उसके स्त्रोतों का उपयोग करेंगे, वो हमारे जीवन में परिवर्तन लायेगा । इसलिये यह जानते हुए प्रयासरत रहें कि वो अपने वादों के प्रति ईमानदार हैं!



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