प्राण और मनुष्य की आत्मा के बीच में क्या अंतर है?



प्रश्न: प्राण और मनुष्य की आत्मा के बीच में क्या अंतर है?

उत्तर:
प्राण और आत्मा ऐसे दो मौलिक अभौतिक या अमूर्त पहलू हैं जिन्हें पवित्रशास्त्र मनुष्य के लिए उपयोग करता है। इन दोनों के मध्य में सटीक भिन्नता को समझने का प्रयास करना उलझन भरा हुआ हो सकता है। शब्द "आत्मा" मनुष्य के अभौतिक पहलू के लिए ही संकेत देता है। मानव प्राणी के पास आत्मा है, परन्तु हम आत्माएँ नहीं हैं। तथापि, पवित्रशास्त्र में, केवल विश्वासियों को ही आत्मिक रूप से जीवित कहा गया है (1 कुरिन्थियों 2:11; इब्रानियों 4:12; याकूब 2:26), जबकि अविश्वासियों आत्मिक रूप से मरे हुए हैं (इफिसियों 2:1-5; कुलुस्सियों 2:13)। पौलुस के लेखों में, आत्मिक होना एक विश्वासी के लिए निर्णायक स्थान रखता था (1 कुरिन्थियों 2:14; 3:1; 1:3; इफिसियों 5:19; कुलुस्सियों 1:9; 3:16)। आत्मा मनुष्य में वह तत्व है जो हमें परमेश्वर के साथ एक घनिष्ठ संबंध बनाने की योग्यता देता है। जब कभी भी शब्द "आत्मा" का उपयोग किया जाता है, तो यह मनुष्य के अभौतिक हिस्से की ओर संकेत देता है जो परमेश्वर के साथ "संबंध" स्थापित करता है, जो स्वयं आत्मा है (यूहन्ना 4:24)।

शब्द "आत्मा" मनुष्य के दोनों अर्थात् अभौतिक या अमूर्त और भौतिक या मूर्त पहलुओं के लिए संकेत दे सकता है। मानव जिसके पास आत्मा है, के विपरीत, मानव प्राणी हैं। अपने सबसे मौलिक अर्थ में, शब्द "प्राण" का अर्थ "जीवन" से है।" परन्तु फिर भी, इस आवश्यक अर्थ से परे, बाइबल प्राण को कई संदर्भों में बोलती है। इनमें से एक मनुष्य की पाप (लूका12:26) करने के लिए उत्सुकता है। मनुष्य स्वाभाविक रूप से बुरा है, और परिणामस्वरूप हमारे प्राण पाप के कारण दूषित हैं। प्राण के जीवन का सिद्धांत भौतिक मृत्यु के समय हटा दिया जाता है (उत्पत्ति 35:18; यिर्मयाह 15:02)। प्राण, जैसे आत्मा के साथ है, कई आत्मिक और भावनात्मक अनुभवों का केन्द्र है (अय्यूब 30:25; भजन संहिता 43:5; यिर्मयाह 13:17)। जब कभी भी शब्द "प्राण" का उपयोग किया जाता, तो इसका संकेत पूरे व्यक्ति के लिए, भले ही वह जीवित है या उसकी मृत्यु के पश्चात् हो सकता है।

प्राण और आत्मा आपस में जुड़े हुए हैं, परन्तु अलग अलग हैं (इब्रानियों 4:12)। प्राण मानव प्राणी का सारतत्व है; यह वह है जो हम हैं। आत्मा मानव प्राणी का वह पहलू है जो हमें परमेश्वर के साथ जोड़ता है।



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